एससी एसटी हिंदू नहीं है वह एक स्वतंत्र और पृथक अल्पसंख्यक वर्ग है-

 


एससी एसटी हिंदू नहीं है वह एक स्वतंत्र और पृथक अल्पसंख्यक वर्ग है-

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की परिभाषा-

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सटीक तौर पर परिभाषा किसी भी कानून में नहीं दी गई है लेकिन फिर भी भारत का संविधान अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों" के वही अर्थ हैं जो संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और खंड (25) में हैं तथा (भाग 16-कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध)

अनुच्छेद 366 (24) " अनुसूचित जातियों" से ऐसी जातियां, मूलवंश या जनजातियां अथवा ऐसी जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भाग या उनमें के यूथ अभिप्रेत है जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए अनुच्छेद 341 के अधीन अनुसूचित जातियां समझा जाता है;

अनुच्छेद 366 (25) " अनुसूचित जनजातियों" से ऐसी जनजातियां या जनजाति समुदाय अथवा ऐसी जनजातियों या जनजाति समुदायों के भाग या उनमें के यूथ अभिप्रेत हैं जिन्हें इससंविधान के प्रयोजनों के लिए अनुच्छेद 342 के अधीन अनुसूचित जनजातियां समझा जाता है;

भारत का संविधान का भाग 16-कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध

341. अनुसूचित जातियां (1) राष्ट्रपति, 2 [ किसी राज्य 3 [ या संघ राज्यक्षेत्र] के संबंध में और जहाँ वह 4*** राज्य है वहां उसके राज्यपाल 5*** से परामर्श करने के पश्चात] लोक अधिसूचना द्वारा, उन जातियों, मूलवंशों या जनजातियों, अथवा जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भागों या उनमें के यूथों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए, [यथास्थिति उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र] के संबंध में अनुसूचित जातियां समझा जाएगा।

(2) संसद्, विधि द्वारा, किसी जाति, मूलवंश या जनजाति को अथवा जाति, मूलवंश या जनजाति के भाग या उसमें के यूथ को खंड (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अनुसूचित जातियों की सूची में सम्मिलित कर सकेगी या उसमें से अपवर्जित कर सकेगी, किन्तु जैसा ऊपर कहा गया है उसके सिवाय उक्त खंड के अधीन निकाली गई अधिसूचना में किसी पश्चात्वर्ती अधिसूचना द्वारा परिवर्तन नहीं किया जाएगा।

342. अनुसूचित जनजातियां (1) राष्ट्रपति, किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में और जहाँ वह 2*** राज्य है वहां उसके राज्यपाल से 3*** परामर्श करने के पश्चात्] लोक अधिसूचना द्वारा, उन जनजातियों या जनजाति समुदायों अथवा जनजातियों या जनजाति समुदायों के भागों या उनमें के यूथों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए, 5 [यथास्थिति उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र] के संबंध में अनुसूचित जनजातियां समझा जाएगा।

(2) संसद्, विधि द्वारा, किसी जनजाति या जनजाति समुदाय को अथवा किसी जनजाति या जनजाति समुदाय के भाग या उसमें के यूथ को खंड (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अनुसूचित जनजातियों की सूची में सम्मिलित कर सकेगी या उसमें से अपवर्जित कर सकेगी, किन्तु जैसा ऊपर कहा गया है उसके सिवाय उक्त खंड के अधीन निकाली गई अधिसूचना में किसी पश्चात्वर्ती अधिसूचना द्वारा परिवर्तन नहीं किया जाएगा।

भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची और अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष उपबंध

भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची में अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और उनके क्षेत्रों के विशेष प्रबंधन से है। यह अनुसूची उन अनुसूचित क्षेत्रोंपर लागू होती है जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा घोषित किया जाता है। इसके अंतर्गत राज्यपाल को यह अधिकार दिया गया है कि वह इन क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष विनियम (Regulations) बना सके, जैसेभूमि के हस्तांतरण पर रोक लगाना, गैर-जनजातियों द्वारा शोषण को नियंत्रित करना, तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सामान्य कानूनों के लागू होने को सीमित या संशोधित करना। इसके साथ ही जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribes Advisory Council) का गठन अनिवार्य किया गया है, जिसमें अधिकांश सदस्य अनुसूचित जनजातियों से होते हैं और जो राज्यपाल को जनजातीय हितों से जुड़े विषयों पर सलाह देती है।

पांचवी अनुसूची का उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हितों की विशेष सुरक्षा करना है, ताकि उनकी परंपराओं, संसाधनों और जीवन-शैली पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। यह अनुसूची संघ (केंद्र) को भी यह अधिकार देती है कि वह राज्यों को इन क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में निर्देश दे सके, जिससे जनजातीय कल्याण सुनिश्चित किया जा सके। ध्यान देने योग्य बात यह है कि पंचम अनुसूची का सीधा संबंध अनुसूचित जातियों (SC) से नहीं है; SC के लिए संविधान में अलग प्रावधान (जैसे अनुच्छेद 341) किए गए हैं। इस प्रकार पंचम अनुसूची एक विशेष संवैधानिक व्यवस्था है, जो अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों की रक्षा और उनके समग्र विकास को सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है

अब हम माननीय सर्वोच्च न्यायालय के मुकदमा जिसका डिटेल  है में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माननीय आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए अपना आदेश Case Details: CHINTHADA ANAND Vs. STATE OF ANDHRA PRADESH AND ORS.|SLP(Crl) No. 9231/2025 दिनांक 24 मार्च 2026 को प्रतिपादित किया है इसमें कहा है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति होने का लाभ सिर्फ हिंदू, जैन और बुद्धिस्ट को ही मिल सकता है जिन लोगों ने ईसाई धर्म या मुस्लिम धर्म को अपना लिया है उन लोगों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति होने का किसी भी प्रकार से लाभ नहीं मिलेगा यह मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने तब प्रतिपादित माननीय जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और माननीय जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने यह फ़ैसला सुनाया Case Details: CHINTHADA ANAND Vs. STATE OF ANDHRA PRADESH AND ORS.|SLP(Crl) No. 9231/2025 माननीय आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश के विरुद्ध, पादरी ने एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की थी  

मामले का संक्षिप्त विवरण "कुछ इस प्रकार से है कि मामले में याचिकाकर्ता का यह दावा नहीं है कि उसने ईसाई धर्म छोड़कर अपने मूल धर्म में वापसी की, या उसे 'मादिका' समुदाय में फिर से स्वीकार कर लिया गया। इससे यह साबित होता है कि अपीलकर्ता ने ईसाई धर्म को अपनाए रखा और वह एक दशक से भी ज़्यादा समय से 'पास्टर' के तौर पर काम कर रहा है और गांव के घरों में हर रविवार को नियमित रूप से प्रार्थना सभाएँ आयोजित करता है। यह बात भी स्वीकार की गई है कि कथित घटना के समय वह अपने घर पर ही प्रार्थना सभाएं आयोजित कर रहा था। ये सभी तथ्य मिलकर इस बात में कोई शक की गुंजाइश नहीं छोड़ते कि घटना के दिन भी वह एक ईसाई ही था।"

इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय में माननीय आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया, जिसमें कहा गया कि एक बार जब कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है और सक्रिय रूप से उसका पालन करता है तो वह अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं रह सकता। माननीय न्यायालय ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जो हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का पालन करता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने आगे कहा कि किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने गौर किया कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में यह बात स्पष्ट की गई और इस आदेश के तहत लगा प्रतिबंध पूर्ण है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1950 के आदेश के खंड 3 में निर्दिष्ट न किए गए किसी भी धर्म में धर्मांतरण करने पर, जन्म की स्थिति चाहे जो भी हो, अनुसूचित जाति का दर्जा तत्काल समाप्त हो जाता है। माननीय न्यायालय ने कहा कि संविधान या किसी अन्य कानून के तहत कोई भी वैधानिक लाभ, सुरक्षा, आरक्षण या अधिकार उस व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता और न ही वह उसका दावा कर सकता है, जिसे खंड 3 के अनुसार अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता है। यह प्रतिबंध पूर्ण है। अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति का ऐसी जाति या जनजाति से संबंधित होना स्पष्ट रूप से सिद्ध होना चाहिए, जिसे संविधान आदेश के तहत विशेष रूप से अधिसूचित और मान्यता प्राप्त हो।

यह आदेश एक ऐसे व्यक्ति के संदर्भ में पारित किया गया, जिसने ईसाई धर्म अपना लिया और एक पादरी के रूप में कार्य कर रहा था, लेकिन उसने कुछ व्यक्तियों के खिलाफ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया था, जिन पर कथित तौर पर उसके साथ मारपीट करने का आरोप था। उसने SC&ST Act के तहत सुरक्षा की मांग की थी, जिसे आरोपी व्यक्तियों ने कानून की दृष्टि से गलत बताते हुए चुनौती दी थी, क्योंकि पादरी ने धर्मांतरण कर लिया था और सक्रिय रूप से ईसाई धर्म का पालन कर रहा था। 30 अप्रैल, 2025 के एक आदेश के माध्यम से आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि जाति व्यवस्था ईसाई धर्म के लिए बाहरी है। इसलिए ऐसे व्यक्ति को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों का लाभ उठाने से वंचित किया जाता है। हाईकोर्ट जज जस्टिस हरिनाथ एन ने उस शिकायतकर्ता द्वारा दायर आरोपों को रद्द कर दिया, जिसने ईसाई धर्म अपना लिया था और SC & ST Act का सहारा लिया था।

इसी क्रम में माननीय सर्वोच्च न्यायालय का दूसरा आदेश जिसमे विवाह करने के बाद भी जाति नहीं बदलती है Valsamma Paul v. Cochin University & Others, (1996) 3 SCC 545 : AIR 1996 SC 1011.

कोचीन विश्वविद्यालय में लेक्चरर के पद पर नियुक्ति से संबंधित इस मामले में एक पद लैटिन कैथोलिक (पिछड़ा वर्ग) के लिए आरक्षित था। अपीलकर्ता, जो जन्म से सीरियन कैथोलिक थी, ने लैटिन कैथोलिक से विवाह करने के बाद स्वयं को पिछड़ा वर्ग मानते हुए आरक्षित श्रेणी में आवेदन किया और चयनित भी हो गई। उसकी नियुक्ति को चुनौती दी गई, जिसे केरल उच्च न्यायालय ने स्वीकार करते हुए कहा कि विवाह के आधार पर पिछड़े वर्ग का लाभ नहीं दिया जा सकता। बाद में मामला भारत का सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, जहाँ यह सिद्धांत स्थापित किया गया कि आरक्षण का लाभ केवल जन्म से प्राप्त सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित होता है, न कि विवाह जैसे माध्यमों से प्राप्त स्थिति पर।

कोचीन विश्वविद्यालय में लेक्चरर के दो रिक्त पद थे, जिनके लिए भर्ती की अधिसूचना जारी की गई थी। एक पद लैटिन कैथोलिक (पिछड़ा वर्ग) के लिए आरक्षित था। अपीलकर्ता, जो एक सीरियन कैथोलिक थी, ने एक लैटिन कैथोलिक से विवाह करने के बाद आरक्षित उम्मीदवार के रूप में चयन के लिए आवेदन किया। विश्वविद्यालय ने उसे उसी के अनुसार चयनित कर लिया। उसकी नियुक्ति को एक अन्य उम्मीदवार द्वारा रिट याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई, जिसमें प्रार्थना की गई कि उक्त पद पर अपीलकर्ता के स्थान पर याचिकाकर्ता की नियुक्ति की जाए। रिट याचिका स्वीकार कर ली गई और यह कहा गया कि नियुक्ति केरल राज्य अधीनस्थ सेवा नियमों के नियम 14 से 17 के अनुसार सख्ती से की जानी चाहिए।

इस निर्णय को अपीलकर्ता द्वारा एक डिवीजन बेंच के समक्ष चुनौती दी गई और अपीलकर्ता ने Dr. Kaniamma Alex v. PSC के निर्णय का हवाला दिया, जिसे PSC v. Dr. Kanjama Alex में बरकरार रखा गया था। डिवीजन बेंच, Dr. Kanjamma Alex मामले के निर्णय को लेकर सुनिश्चित नहीं थी और इस मामले को केरल उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ (Full Bench) के पास भेज दिया। पूर्ण पीठ ने मत व्यक्त किया कि अनुच्छेद 15(4) और 16(4) सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए बनाए गए हैं। विवाह के कारण उम्मीदवारों को पिछड़े समुदाय का सदस्य मानना संविधान का उपहास होगा और उन विशेष प्रावधानों के उद्देश्य को विफल कर देगा जिनके लिए उन्हें बनाया गया है। यह निर्णय दिया गया कि अपीलकर्ता, जो जन्म से एक सीरियन कैथोलिक है, अपने लैटिन कैथोलिक से विवाह के आधार पर पिछड़ी जाति का दर्जा दावा नहीं कर सकती और अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के अंतर्गत आरक्षण की हकदार नहीं है। इस निर्णय के विरुद्ध अनुच्छेद 136 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की गई थी।

Sunita Singh v. State of Uttar Pradesh & Others, (2018) 2 SCC 493 : AIR 2018 SC 783.

इस मामले में प्रश्न यह था कि क्या कोई व्यक्ति विवाह के माध्यम से अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा प्राप्त कर सकता है और आरक्षण का लाभ ले सकता है। याचिकाकर्ता सुनीता सिंह ने एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति से विवाह किया था और इसके आधार पर SC प्रमाणपत्र तथा उससे मिलने वाले लाभों का दावा किया। इस दावे को प्रशासनिक स्तर पर चुनौती दी गई, जिसके बाद मामला न्यायालय तक पहुँचा। विवाद का मूल मुद्दा यह था कि क्या विवाह के कारण सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन की स्थिति स्वतः प्राप्त हो जाती है, जो आरक्षण का आधार है।

भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति का दर्जा जन्म से निर्धारित होता है, न कि विवाह से। न्यायालय ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य उन वर्गों को लाभ देना है, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न सहा है। यदि विवाह के आधार पर किसी को SC का लाभ दिया जाए, तो यह संविधान के उद्देश्यों के विपरीत होगा। इस प्रकार न्यायालय ने यह सिद्धांत पुनः स्थापित किया कि केवल विवाह के आधार पर SC/ST का दर्जा या आरक्षण का लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता।

बाबा साहब डॉ० अंबेडकर दलित समुदाय एससी एसटी को पृथक और स्वतंत्र अल्पसंख्यक समुदाय मानते थे।

बाबा साहब डॉ. बी.आर. अंबेडकर का दलितों और हिंदू धर्म के अंतर्संबंधों पर दृष्टिकोण केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक और संवैधानिक तर्क पर आधारित था। 1931 के दूसरे गोलमेज सम्मेलन के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार के समक्ष पूरी प्रखरता से यह पक्ष रखा कि अछूत (दलित) हिंदू समाज का अभिन्न अंग नहीं हैं, बल्कि वे एक पृथक और स्वतंत्र अल्पसंख्यक समुदाय हैं। उनका तर्क था कि जिस धर्म की वर्ण व्यवस्था और शास्त्र (जैसे मनुस्मृति) एक बड़े वर्ग को मानवीय अधिकारों से वंचित रखते हों और उन्हें सामाजिक सोपान में सबसे नीचे रखते हों, वह वर्ग उस धर्म का हिस्सा कैसे माना जा सकता है? अपनी प्रसिद्ध कृति 'एनीहिलेशन ऑफ कास्ट' में उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म सिद्धांतों के बजाय नियमों का एक समूह मात्र है, जो जातिवाद को धार्मिक मान्यता प्रदान करता है। अंबेडकर का मानना था कि दलितों को हिंदू पहचान के भीतर केवल उनकी संख्यात्मक शक्ति के उपयोग के लिए रखा गया है, जबकि सामाजिक स्तर पर उन्हें 'बाहरी' (Outcastes) ही माना जाता रहा। उनके अनुसार, दलितों की मुक्ति केवल तभी संभव थी जब उन्हें एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मिले, न कि उन्हें हिंदू धर्म की एक शाखा के रूप में देखा जाए।

संवैधानिक विकास के क्रम में बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने इस वैचारिक आधार को कानूनी जामा पहनाने का कार्य किया। उन्होंने 'हु वर द शूद्राज़?' के माध्यम से यह ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत किया कि किस प्रकार एक विशिष्ट वर्ग को धार्मिक प्रणालियों के माध्यम से हाशिए पर धकेला गया। भारत की संविधान सभा में प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में, उनका मुख्य संघर्ष अनुसूचित जातियों को 'अल्पसंख्यक' का दर्जा दिलाकर उनके लिए विशेष संवैधानिक सुरक्षा कवच तैयार करना था। यद्यपि संविधान सभा में उन्होंने सीधे तौर पर हिंदू धर्म के आध्यात्मिक पक्ष पर प्रहार करने के बजाय प्रशासनिक और विधायी समाधानों पर ध्यान केंद्रित किया, लेकिन उनका उद्देश्य स्पष्ट थादलितों को एक ऐसी पहचान दिलाना जो सवर्ण हिंदुओं के प्रभुत्व से मुक्त हो। उन्होंने आरक्षण और विशेष प्रतिनिधित्व की वकालत इसी आधार पर की थी कि दलित एक अलग सामाजिक इकाई हैं जिनकी ज़रूरतें और ऐतिहासिक पीड़ा सामान्य हिंदू समाज से सर्वथा भिन्न हैं। उनके लिए दलित पहचान का अर्थ केवल जातिगत नहीं, बल्कि एक गरिमापूर्ण और स्वतंत्र नागरिक पहचान था, जिसे उन्होंने भारतीय न्यायशास्त्र और विधायी ढांचे में मजबूती से स्थापित करने का प्रयास किया।

बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया

बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करना केवल एक व्यक्तिगत आध्यात्मिक निर्णय नहीं, बल्कि सदियों से दमित और शोषित समाज को मानवीय गरिमा और आत्म-सम्मान दिलाने की दिशा में एक सोची-समझी सामाजिक-वैचारिक क्रांति थी। हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था और छुआछूत जैसी कुरीतियों के विरुद्ध दशकों तक संघर्ष करने के बाद, बाबासाहेब इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि जिस धर्म में मनुष्य को मनुष्य नहीं समझा जाता, वहां दलितों का उत्थान असंभव है। वर्ष 1935 में येवला सम्मेलन में की गई उनकी प्रसिद्ध घोषणा—"मैं हिंदू पैदा हुआ हूं, लेकिन हिंदू रहकर मरूंगा नहीं"उनके उस आंतरिक आक्रोश और न्याय की खोज का परिणाम थी, जिसने उन्हें एक ऐसे मार्ग की तलाश के लिए प्रेरित किया जहाँ 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के सिद्धांत सर्वोपरि हों। उन्होंने इस्लाम, ईसाई और सिख जैसे विभिन्न धर्मों का गहन तुलनात्मक अध्ययन किया, परंतु अंततः बुद्ध के मार्ग को चुना क्योंकि बुद्ध का 'धम्म' तर्क (Reason), प्रज्ञा (Wisdom) और करुणा (Compassion) पर आधारित था, जिसमें ईश्वर या किसी अलौकिक शक्ति के स्थान पर मनुष्य के नैतिक आचरण को प्रधानता दी गई थी।

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में धम्म दीक्षा के समय बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएं दिलाई थीं। इन प्रतिज्ञाओं का मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म की कुरीतियों, अंधविश्वासों और ऊंच-नीच की मानसिकता को पूरी तरह त्याग कर एक न्यायपूर्ण और तार्किक जीवन पद्धति को अपनाना था।

यहाँ उन 22 प्रतिज्ञाओं का संक्षिप्त और स्पष्ट वर्णन है:

पुरानी मान्यताओं का त्याग (प्रतिज्ञा 1-8)

पहली आठ प्रतिज्ञाएं हिंदू देवी-देवताओं और पुरानी धार्मिक मान्यताओं से दूरी बनाने पर केंद्रित हैं:

1.     मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में विश्वास नहीं रखूँगा और न ही उनकी पूजा करूँगा।

2.     मैं राम और कृष्ण, जिन्हें भगवान का अवतार माना जाता है, में विश्वास नहीं रखूँगा और न ही उनकी पूजा करूँगा।

3.     मैं गौरी, गणपति और हिंदुओं के अन्य देवी-देवताओं में विश्वास नहीं रखूँगा और न ही उनकी पूजा करूँगा।

4.     मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता।

5.     मैं इस बात पर विश्वास नहीं करता कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे। मेरा मानना है कि यह केवल पागलपन और झूठा प्रचार है।

6.     मैं 'श्राद्ध' नहीं करूँगा और न ही पिंड-दान करूँगा।

7.     मैं बुद्ध के सिद्धांतों और शिक्षाओं के विरुद्ध कोई काम नहीं करूँगा।

8.     मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा।

बौद्ध धम्म के सिद्धांतों को अपनाना (प्रतिज्ञा 9-16)

इन प्रतिज्ञाओं में समानता और नैतिक आचरण पर जोर दिया गया है:

9.     मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ।

10.                   मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा।

11.                   मैं बुद्ध के 'अष्टांगिक मार्ग' का अनुसरण करूँगा।

12.                   मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित 'दस पारमिताओं' का पालन करूँगा।

13.                   मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार रखूँगा और उनकी रक्षा करूँगा।

14.                   मैं चोरी नहीं करूँगा।

15.                   मैं झूठ नहीं बोलूँगा।

16.                   मैं कामुक पापों (व्यभिचार) को नहीं करूँगा।

नया जीवन और संकल्प (प्रतिज्ञा 17-22)

अंतिम प्रतिज्ञाएं व्यक्तिगत सुधार और धर्म परिवर्तन के संकल्प को पुष्ट करती हैं:

17.                   मैं शराब, ड्रग्स और नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा।

18.                   मैं अपने दैनिक जीवन में अष्टांगिक मार्ग का पालन करने और करुणा व दया का अभ्यास करने का प्रयास करूँगा।

19.                   मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ, जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति में बाधा डालता है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और मैं बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ।

20.                   मैं पूरी तरह से विश्वास करता हूँ कि बुद्ध का धम्म ही एकमात्र सच्चा धर्म है।

21.                   मेरा मानना है कि मेरा नया जन्म हो रहा है।

22.                   मैं गंभीरता से घोषणा करता हूँ कि मैं आज से बुद्ध की शिक्षाओं के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करूँगा।

ये प्रतिज्ञाएं केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक स्वतंत्रता का घोषणापत्र थीं। बाबासाहेब चाहते थे कि उनका समाज मानसिक दासता से मुक्त होकर स्वाभिमान के साथ जिए। भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। उन्होंने बौद्ध धर्म को ही इसलिए प्राथमिकता दी क्योंकि यह भारत की अपनी मिट्टी का धर्म था, जिसकी जड़ें स्वदेशी थीं और जो किसी भी प्रकार की विदेशी निष्ठा की मांग नहीं करता था। बुद्ध के दर्शन में जातिगत भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं था और वहां 'समता' का शासन था। बाबासाहेब ने अपनी पुस्तक 'बुद्ध और उनका धम्म' में स्पष्ट किया कि धम्म का अर्थ सामाजिक सुधार है, जहाँ मनुष्य का मूल्य उसके जन्म से नहीं बल्कि उसके कर्म और चरित्र से आँका जाता है। उन्होंने अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएं दिलाईं, जिनका मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म के कर्मकांडों, अंधविश्वासों और ऊंच-नीच की मानसिकता को जड़ से उखाड़ फेंकना था। यह धर्म परिवर्तन वास्तव में एक 'धम्मचक्र प्रवर्तन' था, जिसने लाखों दलितों को 'अछूत' की हीन भावना से मुक्त कर उन्हें एक नई पहचान, गौरव और आधुनिक भारत के नागरिक के रूप में सिर उठाकर जीने का साहस प्रदान किया।

बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर के इस महान कदम का दूरगामी प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने भारत के सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक परिदृश्य को भी मौलिक रूप से प्रभावित किया। बौद्ध धर्म अपनाने के बाद दलित समाज में शिक्षा के प्रति एक अभूतपूर्व चेतना जागी, क्योंकि बुद्ध का मार्ग 'अप्प दीपो भव' (अपना दीपक स्वयं बनो) का संदेश देता था। इसने मानसिक दासता की उन बेड़ियों को काट दिया जिन्होंने सदियों से एक बड़े जनमानस को यह विश्वास दिला रखा था कि उनकी दरिद्रता उनके पिछले जन्मों के पापों का फल है। बाबासाहेब ने साबित किया कि धर्म को मनुष्य के कल्याण का साधन होना चाहिए, न कि उसे गुलाम बनाने का हथियार। आज भी नागपुर की दीक्षाभूमि दुनिया भर के लिए समानता और न्याय का प्रतीक है, जो हमें यह याद दिलाती है कि बाबासाहेब का धर्म परिवर्तन वास्तव में मानव अधिकारों की बहाली का एक वैश्विक घोषणापत्र था। यह आंदोलन आज भी करोड़ों लोगों को शोषण के विरुद्ध खड़े होने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है, जिससे भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती मिली है।

न्यायिक निर्णयों का अनुसूचित जाति एवं जनजाति पर प्रभाव-

भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में न्यायपालिका को 'अधिकारों का संरक्षक' माना गया है, किंतु अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संदर्भ में पारित हालिया न्यायिक आदेशों की श्रृंखला एक विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न करती है। 'वलसम्मा पॉल', 'सुनीता सिंह' और हालिया 'चिंतादा आनंद' जैसे मामलों में माननीय न्यायालय का दृष्टिकोण सामाजिक न्याय की व्यापक अवधारणा के बजाए प्रक्रियात्मक कठोरता की ओर अधिक झुका हुआ प्रतीत होता है। यह एक विडंबना ही है कि माननीय न्यायाधीशगण, जो समाज की गहरी असमानताओं और ऐतिहासिक अन्याय से भली-भांति परिचित हैं, उनके द्वारा दिए गए निर्णयों का सीधा और सबसे गहरा नुकसान इन्हीं वंचित वर्गों को उठाना पड़ रहा है। जब न्यायालय 'जाति' को जन्मजात और अमिट मानता है, तो वही तर्क धर्म परिवर्तन के समय शून्य क्यों हो जाता है? इस प्रकार के आदेश न केवल इन वर्गों के संवैधानिक सुरक्षा कवच को कमजोर करते हैं, बल्कि उनके भीतर यह संदेश भी भेजते हैं कि व्यवस्था उन्हें मुख्यधारा में बराबरी का स्थान देने के प्रति संशय में है।

अक्सर यह देखा गया है कि जब भी इन समुदायों को मिलने वाले लाभों के विस्तार या उनकी सुरक्षा की बात आती है, तो 'योग्यता' (Merit) या 'धार्मिक शुद्धता' जैसे तर्क सामने लाकर उनके अधिकारों की परिधि को संकुचित कर दिया जाता है। बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि ये वर्ग एक 'पृथक अल्पसंख्यक पहचान' रखते हैं, जिनकी सुरक्षा राज्य का प्राथमिक कर्तव्य है। किंतु, वर्तमान न्यायिक परिदृश्य में 'क्रीमी लेयर' या 'उप-वर्गीकरण' जैसे सिद्धांतों के माध्यम से इस आरक्षण की मूल आत्मा को ही विभाजित करने का प्रयास दिखता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं यह भय व्याप्त है कि यदि ये समुदाय पूर्ण रूप से सशक्त हो गए या समाज में कुछ क्रांतिकारी 'नया' करने की स्थिति में आ गए, तो पारंपरिक शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा। न्यायालयों द्वारा बार-बार दिए जाने वाले ये आदेश, जो तकनीकी रूप से कानून सम्मत दिख सकते हैं, वास्तव में उस 'सामाजिक न्याय' की जड़ों पर प्रहार करते हैं जिसके लिए संविधान सभा में भीषण बहस हुई थी। अंततः, यदि न्यायपालिका इन वर्गों के संघर्ष और उनकी जन्मजात पहचान को केवल एक धर्म या वैवाहिक स्थिति के तराजू पर तौलती रहेगी, तो यह उन करोड़ों लोगों के साथ ऐतिहासिक अन्याय की निरंतरता ही मानी जाएगी।

निष्कर्ष

उपरोक्त न्यायिक मिसालों का सूक्ष्म विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 'वलसम्मा पॉल' और 'सुनीता सिंह' के मामलों में 'जाति' को एक अमिट जन्मजात सच्चाई माना है, जिसे विवाह जैसे व्यक्तिगत चुनाव से बदला नहीं जा सकता। न्यायालय का यह तर्क कि आरक्षण उन ऐतिहासिक कष्टों और सामाजिक अपमान की क्षतिपूर्ति है जो एक व्यक्ति ने जन्म से झेले हैं, पूरी तरह तर्कसंगत प्रतीत होता है। किंतु, 'चिंतादा आनंद' के मामले में यही तर्क पलटा हुआ दिखाई दे रहा है। यदि जाति का दंश जन्म से जुड़ा है और वह विवाह से नहीं मिटता, तो केवल धर्म परिवर्तन मात्र से वह सदियों का संचित अपमान और 'अछूत' होने का सामाजिक कलंक कैसे समाप्त हो सकता है? यह एक गहरा विरोधाभास है कि एक ओर न्यायालय जन्म को प्रधानता देता है, वहीं दूसरी ओर धर्म परिवर्तन को आधार बनाकर उस जन्मजात पहचान और उससे जुड़े संरक्षण को छीन लेता है।

यह स्थिति डॉ. बी.आर. अंबेडकर के उन मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध खड़ी दिखाई देती है, जिसमें उन्होंने 'हु वर शूद्रास' और 'एनिहिलेशन ऑफ कास्ट' में स्पष्ट किया था कि अछूत वर्ग हिंदू वर्ण व्यवस्था का हिस्सा कभी था ही नहीं, बल्कि वह एक 'स्वतंत्र और पृथक अल्पसंख्यक वर्ग' है। बाबासाहेब ने अपनी 22 प्रतिज्ञाओं के माध्यम से यह संदेश दिया था कि हिंदू धर्म की मान्यताओं का त्याग करना आत्म-सम्मान की प्राप्ति का मार्ग है। यदि कोई व्यक्ति बाबासाहेब की प्रतिज्ञाओं का अनुसरण करते हुए सामाजिक मुक्ति के लिए धर्म बदलता है, तो राज्य द्वारा उसके 'जन्म आधारित' अधिकारों को केवल धार्मिक पहचान के आधार पर समाप्त करना संविधान की उस मूल भावना का उपहास है जो सामाजिक न्याय की बात करती है। निष्कर्षतः, न्यायपालिका को यह स्वीकार करना होगा कि जिस 'अन्याय और अत्याचार' को जन्म के आधार पर 'वलसम्मा पॉल' में मान्यता दी गई है, वह धर्म बदलने से विलीन नहीं हो जाता; अतः सामाजिक सुरक्षा के प्रावधानों को धार्मिक सीमाओं से मुक्त कर केवल ऐतिहासिक और जन्मजात पिछड़ेपन की कसौटी पर ही कसा जाना चाहिए।

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह

एडवोकेट हाईकोर्ट इलाहाबाद

मो०- 9532112005

 


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