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Showing posts from May, 2026

UGC विनियम 2026 पर रोक और BHU विवाद : क्या सामाजिक न्याय फिर पीछे धकेला जा रहा है?

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University Grants Commission के प्रस्तावित UGC विनियम 2026 का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में प्रवेश और नियुक्ति प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और भेदभावमुक्त बनाना था। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि इन विनियमों पर रोक लगने के बाद फिर वही पुराने सवाल खड़े होने लगे हैं, जो वर्षों से भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। हाल ही में Banaras Hindu University में पीएचडी प्रवेश को लेकर सामने आया विवाद इसका ताजा उदाहरण माना जा रहा है। एक छात्रा ने आरोप लगाया कि OBC वर्ग में उच्च रैंक होने के बावजूद उसे मेन कैंपस के स्थान पर संबद्ध कॉलेज आवंटित कर दिया गया, जबकि कम रैंक वाले अन्य छात्रों को मेन कैंपस दिया गया। मामला अब National Commission for Backward Classes तक पहुंच चुका है। यह केवल एक छात्रा का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संस्थागत पारदर्शिता पर गंभीर बहस है। यदि UGC विनियम 2026 लागू होते, तो संभवतः प्रवेश प्रक्रिया अधिक स्पष्ट, डिजिटल निगरानी आधारित और उत्तरदायी होती। ऐसी स्थिति में किसी छात्र को उसकी श्रेणी, मेरिट या अधिकारों को लेकर भ्रम और भेदभाव का...

दलित का वैभव क्यों चुभता है? : मायावती की सैंडल से सवर्ण मानसिकता तक

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2011 में टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडिया टाइम्स की एक चर्चित रिपोर्ट में तत्कालीन उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बहन कुमारी मायावती की जीवनशैली और सुरक्षा व्यवस्था का उल्लेख करते हुए लिखा गया था — “When she needed new sandals, her private jet flew empty to Mumbai.” अर्थात जब उन्हें नई सैंडल चाहिए होती थीं, तो उनका निजी विमान खाली मुंबई भेजा जाता था। रिपोर्ट में उनकी सुरक्षा व्यवस्था को भी “किसी राष्ट्राध्यक्ष जैसी” बताया गया। प्रश्न यह नहीं है कि किसी मुख्यमंत्री की सुरक्षा या जीवनशैली कैसी थी। असली प्रश्न यह है कि ऐसी खबरों को जिस अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया, उसके पीछे छिपी मानसिकता क्या थी? दरअसल भारत में दलितों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त होने से सवर्ण तथा गैर दलित समाज के लोगों को बर्दाश्त नहीं होता इस पर एक अच्छी कहावत याद आती है तो कड़वा ऊपर से नीम पर चढ़ा अर्थात दलित होना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी समस्या उसे पर से दलित महिला सत्ता के सर्वोच्च पद पर पहुंचकर सम्मान और वैभव के साथ जीवन जीती है, तो वही चीज़ अचानक मीडिया की “सनसनी” बन जाती है। और पूरे देश में अफवाहों का बाजार ग...

सामाजिक एकता का भ्रम और दलित समाज की चेतावनी

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जब किसी गैर-दलित या सवर्ण पर प्रशासनिक अन्याय होता है, तो पूरा समाज एकजुट हो जाता है और उस भीड़ में सबसे बड़ी संख्या दलित वर्ग की होती है। लेकिन जब यही अन्याय किसी दलित पर होता है, तो वही गैर-दलित समाज मूकदर्शक बन जाता है और उसे कभी आंदोलन का रूप नहीं देता। दलित समाज को अब यह ढोंग बंद करना होगा। यदि संकट में वे आपके साथ खड़े नहीं होते, तो प्रशासनिक स्तर पर होने वाले उनके किसी भी आंदोलन या भेदभाव में उनका साथ देना तुरंत बंद करें। अपनी शक्ति और एकजुटता को केवल अपनों के स्वाभिमान के लिए आरक्षित रखें और अपने समाज अर्थात गैर दलितों के साथ हो रहे भेदभाव के साथ ही खड़े रहे।