भारत का संविधान और डॉ अंबेडकर का योगदान
भारत कासंविधान और डॉ अंबेडकर का योगदान
भारत के संविधान के
निर्माण में कल 22 समितियों को संविधान के निर्माण के लिए
कार्यभार सौपा गया था इस 22 समितियां में 8 प्रमुख (major
committees) तथा 14 छोटी लघु समितियां में वर्गीकृत किया गया था।
इन समितियां में मुख्य रूप भारतीय संविधान
प्रारूप समिति इसके अध्यक्ष डॉ भीमराव अंबेडकर जी ने भारतीय संविधान का शिल्पकार
कहा जाता है इस समिति में कुल सात सदस्य थे किंतु संविधान के निर्माण में 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन का
समय लगा था संविधान के निर्माण में संविधान सभा में सत्र और बैठकों की संख्या लगभग
कल 11 सत्रों में हुई थी जिसमें लगभग 165 से 166 दिन की
बैठक की गई थी तथा प्रारूप संविधान के मसौदा पर विधानसभा में 114 दिन तक
व्यापक बहस हुई थी इस दौरान काफी संशोधनों वाले प्रस्ताव पर भी विचार किया गया था। भारत के संविधान के निर्माण में कुल संविधान सभा
में सदस्यों की सं 389 थी लेकिन विभाजन के बाद उन सदस्यों की सं- 299 हो गई
इसमें स्वयं डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भी शामिल थे वह बंगाल के विभाजन के कारण हुआ था
डॉ० अंबेडकर की सदस्यता समाप्त हो गई थी लेकिन यह बात बहुत ध्यान देने की बात है
कि उन्हें वापस क्यों और किसके कहने पर संविधान सभा में लाया गया और उसकी क्या
प्रक्रिया रही संविधान सभा में श्री एस० वी० पायली (अंबेडकर वॉल्यूम 40 हिंदी
पृष्ठ सं 137) में कहा कि के दूसरे पैराग्राफ "बंगाल के विभाजन के
कारण वहां से चुने गए कुछ सदस्यों का संविधान सभा की सदस्यता समाप्त हो गयी थी
उनमें डॉ. बाबासाहेबें अम्बेडकर भी शामिल थे। तब तक के उनके कार्य से संविधान सभा
को उनकी संविधान विशेषज्ञता और उनके मार्गदर्शन की और उनके सहयोग की बेहद जरुरत
महसूस हो रही थी। इस बात का अहसास डॉ. राजेंद्रप्रसाद के मुंबई प्रांत के तत्कालीन
मुख्यमंत्री श्री बी. जी. खेर को 30 जून, 1947 को लिखे खत
से होता है। अपने खत में लिखते हैं. 'अन्य किसी बात के
बारे में न भी सोचें तो हमें अब लगने लगा है कि संविधान सभा और जिन विभिन्न
समितियों पर डॉ. अम्बेडकर की नियुक्ति हुई उनमें उनका कार्य इतना अमूल्य है कि हम
उनके योगदान से वंचित नहीं रहना चाहते। वह बंगाल से चुन कर आए थे। उस प्रांत के
विभाजन के बाद उनका संविधान सभा की सदस्यता खत्म हो चुकी थी। संविधान सभा का अगला
सत्र दिनांक 14 जुलाई से शुरू हो रहा है और मैं चाहता
हूं कि उसमें उनकी सहभागिता हो। इसीलिए, तुरंत उनकी
नियुक्ति हो।" इस प्रकार जुलाई 1947 में मुंबई प्रांत
से डॉ. अम्बेडकर को दोबारा संविधान सभा के लिए चुना गया।" जबकि 26 नवंबर 1949 को संविधान
सभा ने बाबा साहेब द्वारा लिखित संविधान को अंगीकृत किया है लेकिन 26 जनवरी सन 1950 को संविधान
पूरे भारत में लागू हुआ है।
भारत के संविधान
में अनुच्छेदों की सं- को दो तरह से समझा जाता है:- मूल/क्रमांकित अनुच्छेद (Original
Articles): जब संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू
हुआ था, तो इसमें 395 अनुच्छेद थे। वर्तमान संख्या (Current
Count): विभिन्न संशोधनों (Amendments) के कारण कई नए
अनुच्छेद जोड़े गए हैं, जैसे- 21A, 51A, 243A से 243Z तक के
अनुच्छेद, आदि इसलिए, गिनती के आधार पर वर्तमान में भारतीय
संविधान में लगभग 448 से अधिक अनुच्छेद हैं, जो 25 भागों और 12
अनुसूचियों में विभाजित हैं हालांकि, अंतिम क्रमांकित
अनुच्छेद आज भी 395 ही है। नए अनुच्छेद हमेशा किसी मौजूदा
अनुच्छेद के साथ अंग्रेजी अक्षरों (39A, 243B, 300A, आदि) के
रूप में जोड़े जाते हैं, न कि एक नए क्रमांक (जैसे 396) के रूप में
है ।
भारत के संविधान
में पूना पैक्ट समझौता अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लिए एक काला दिवस की
तरह है क्योंकि पूना पैक्ट समझौता दलितों को प्रत्येक निर्वाचक मंडल ना दिया जाए
इसलिए महात्मा गांधी ने सिनांक 20 सितंबर 1932 को पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल अनशन
पर बैठ गए थे गांधीजी के अनशन और देशव्यापी दबाव के कारण, बाबा साहेब
डॉ. अंबेडकर को समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा अपनी मांग पृथक निर्वाचन मंडल
के विरुद्ध समझौता करना पड़ा इस समझौते को पूना पैक्ट समझौता के नाम से जाना जाता है।
पूना पैक्ट समझौता क्या है ।
संविधान निर्माता
बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा दलित वर्गों (अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित
जनजाति) के लिए विशेष पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorate) की
व्यवस्था की गई थी, जिसके द्वारा वे केवल अपने समुदाय के उम्मीदवारों
को वोट दे सकते थे इसके लिए बाबा साहेब ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड
को अगस्त 1932 में गोल में सम्मेलन में एक मेमोरेंडम दिया था जिसमें यह मांग की गई
थी कि बंगाल, मध्य प्रांत, असम, बिहार, उड़ीसा, पंजाब तथा संयुक्त प्रांत में
दलितों का प्रतिनिधित्व साइमन कमीशन रिपोर्ट और इंडियन सेंट्रल कमेटी द्वारा
अनुमानित जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए, मद्रास में दलित
वर्ग के लिए 22% का प्रतिनिधित्व होना चाहिए, मुंबई में लगभग 16% का प्रतिनिधित्व
होना चाहिए, मुंबई प्रेसिडेंसी में से सिंध को अलग हो जाने से सिंध में
दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व मुसलमान के प्रतिनिधित्व के बराबर होगा क्योंकि दोनों
की जनसंख्या समान है तथा संघीय विधानमंडल में विशेष प्रतिनिधित्व की मांग बाबा
साहेब ने किया था। (यहाँ पर विस्तृत व्याख्या करना मुश्किल है)
पूना पैक्ट समझौते
के बाद दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का अंत हो गया इसके बदले (जो आज
वर्तमान समय में निर्वाचन व्यवस्था) संयुक्त निर्वाचक मंडल (Joint
Electorate) की व्यवस्था को स्वीकार किया गया, जिसके परिणाम स्वरूप आरक्षित सीटों की वृद्धि
हुई। प्रांतीय विधानमंडलों में दलित वर्गों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या को 71
से बढ़ाकर 148 कर दिया गया। केंद्रीय विधानमंडल में भी दलित वर्गों को कुल सीटों
का 18% आरक्षण दिया गया। इस समझौते के कारण बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर
बहुत दुखी थे तब उन्होंने भारतीय संविधान
में आरक्षण (Reservation) की नींव रखी। संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के तहत
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित
जनजातियों (ST) के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान सीधे इसी समझौते से
प्रेरित है समझौते में यह भी प्रावधान था कि सार्वजनिक
सेवाओं में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने और शिक्षा अनुदान का एक
हिस्सा उनके लिए निर्धारित करने के लिए उचित प्रयास किए जाएंगे। ये प्रावधान भी
संविधान के तहत सकारात्मक कार्रवाई (जैसे अनुच्छेद 16(4) के तहत नौकरियों में
आरक्षण) और शिक्षा के प्रावधानों के लिए प्रेरणा बने।
इस समझौते
से अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति को क्या नुकसान हुआ:
Ø स्वतंत्र
राजनीतिक शक्ति का अभाव: सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि पृथक निर्वाचक
मंडल को त्यागने से दलित वर्गों को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनाने का अवसर
नहीं मिला। संयुक्त निर्वाचक मंडल की व्यवस्था में, आरक्षित सीट पर
दलित उम्मीदवार को जीतने के लिए गैर-दलित (सवर्ण) मतदाताओं पर निर्भर रहना पड़ा।
Ø रबर
स्टाम्प' प्रतिनिधियों का उदय: आलोचकों का मानना
है कि इस निर्भरता के कारण, आरक्षित सीटों से अक्सर ऐसे उम्मीदवार चुने
गए जो गैर-दलितों की पसंद के थे या उनके प्रति वफादार थे, न कि वे जो
दलित वर्गों के वास्तविक हितों का मजबूती से प्रतिनिधित्व करते। डॉ. अंबेडकर ने
आशंका व्यक्त की थी कि ये नेता 'रबर स्टाम्प' या 'दलाल' बन जाएंगे
इसी कारण से मान्यवर कांशीराम साहब ने चमचा युग नामक पुस्तक लिखी है। ।
पूना पैक्ट समझौते
के बाद डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने क्या कहा था:
डॉ. अंबेडकर ने
भारी मन से इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। उनके विचार उनके आंतरिक संघर्ष और
असंतुष्टि को दर्शाते हैं:
Ø अंबेडकर ने
स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने यह समझौता गांधीजी के जीवन को बचाने के लिए किया, न कि अपनी
इच्छा से। उन्होंने इसे अपने जीवन की एक बड़ी गलती माना।
Ø उन्होंने
गांधीजी की पृथक निर्वाचक मंडल के विरोध करने की हठधर्मिता और इसके लिए अनशन करने
की नीति की आलोचना की। उन्होंने कहा कि गांधीजी ने अपने अनशन से एक प्रकार का
भावनात्मक ब्लैकमेल किया, जिससे उन्हें समझौते के लिए मजबूर होना
पड़ा।
Ø डॉ.
अंबेडकर को आशंका थी कि संयुक्त निर्वाचक मंडल दलितों को प्रभावी प्रतिनिधित्व
नहीं दे पाएगा। उन्होंने कहा था कि "आज मैंने एक ऐसी प्रणाली को स्वीकार किया
है जो मुझे राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो देती है, लेकिन मुझे
वास्तविक शक्ति नहीं देती।" उनका मानना था कि आरक्षित सीटों पर जीतने वाले
उम्मीदवार सवर्ण मतदाताओं के दबाव में रहेंगे।
भारत का संविधान
बनाम बी० एन० राव
कुछ लोगों का मानना
है कि जैसा की सोशल मीडिया तथा कुछ मूर्खों के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल
किया जा रहे हैं उस वीडियो से हमे ज्ञात हुआ है कि उनका मानना है कि संविधान के
निर्माता बी एन राव है लेकिन उन विद्वान लोगों को इस बात की जरा सी भी जानकारी
नहीं है कि बी एन राव कौन थे उनका संविधान की कुल 22 समितियां में क्या स्थान था
लिए थोड़ा सा हम इस पर चर्चा करते हैं-
1. सबसे पहले
तो आपको यह बताना ज्यादा जरूरी है कि संविधान निर्माण में जिन समितियां को बनाया
गया था उन सभी समित्तियो में बी एन राव किसी भी समिति के ना तो सदस्य नहीं थे और
ना ही अध्यक्ष थे।
2. यदि भारत
का संविधान की रचनाकार बी० एन० राव होते तो विश्व हिंदू परिषद तथा हिंदू महासभा ने
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का पुतला क्यों फूका और उनके मुर्दे बाद का नारा क्यों
लगाया।
3. बी0एन0 राव ब्रिटिश
काल की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा (ICS) में थे (आज की IAS के समान)
उनका चयन सन् 1910 में चयनित हुए वे बंगाल प्रांत में डिप्टी कलेक्टर, मजिस्ट्रेट
और बाद में सेक्रेटरी (सचिव) के पदों पर कार्य किया। 1935 के बाद वे कई विधानिक
सुधारों में शामिल रहे ।
4. सन् 1946 भारत
सरकार के संवैधानिक सलाहकार थे
5. संयुक्त
राष्ट्र संघ में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सन् 1946–1949 के बीच, वे भारत के
प्रतिनिधि रहे।
6. इस दौरान
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की कानूनी और राजनैतिक स्थिति को मजबूत किया।
7. 1952 में, वे पहले
भारतीय न्यायाधीश बने जिन्हें हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में
नियुक्त किया गया।
8. उन्होंने
1953 तक इस पद पर कार्य किया (उनका निधन भी 1953 में ही हुआ)।
9. संविधान के
निर्माण में बी0 एन0 राव भारत सरकार के संवैधानिक सलाहकार थे
उन्होंने संविधान का कच्चा मसौदा तैयार किया था लेकिन बी एन राव द्वारा तैयार किए
गए संविधान के कच्चा मसौदा पर संविधान प्रारूप समिति का निर्णय कुछ इस प्रकार से
है जो कि (अंबेडकर वॉल्यूम 40 पृष्ठ संख्या 255 आंशिक भाग) 29 अगस्त, 1947 के
दिन संविधान सभा में आयु, सत्यनारायण सिन्हा
द्वारा निम्नलिखित सात सदस्यों की मसौदा समिति गठित करने के बारे में प्रस्ताव रखा
था जिसे सभा द्वारा मंजूर किया गया। प्रस्ताव में सम्मिलित सात सदस्यों के नाम
निम्नानुसार थे-
·
अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर
·
एन. गोपालस्वामी अयंगार
·
डॉ. बी. आर. आंबेडकर
·
के. एम. मुन्शी
·
सैय्यद मोहम्मद सादुल्ला
·
बी. एल. मित्तल
·
डी. पी. खेतान'
30 अगस्त, 1947 के
दिन डॉ. अम्बेडकर को मसौदा समिति के अध्यक्ष के तौर पर सर्वसम्मति से चुना गया। इस
समिति की पहली बैठक 27 अक्तूबर, 1947 को हुई। इस
दरमियान के दो महीने के समय में संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्रप्रसाद का एक
पत्र मसौदा समिति के नाम डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को मिला। इस पत्र को बैठक में
प्रस्तुत किया गया। उस पत्र में कहा गया था कि संविधान समिति की बैठक दिसंबर माह
के मध्य में होने के कारण राव के ड्राफ्ट का सभी सदस्यों में वितरण किया जाए। इस
पर डॉ. अम्बेडकर के साथ सभी अन्य सदस्यों ने अपनी राय दर्ज की कि इसकी कोई जरूरत
नहीं क्योंकि इस ड्राफ्ट और उपसमितियों की रिपोर्ट को ध्यान में रख कर संविधान का
नया मसौदा बनाना है।
इस दरमियान
अर्थात् 30 अगस्त, 1947 के बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर
ने कार्यालय द्वारा बनाए गए मसौदे की सभी धाराओं का निरीक्षण कर अपनी शब्द रचना
वाली धाराएं बनाई थीं। 27 अक्तूबर 1947 से संविधान सलाहकार के कार्यालय द्वारा
तैयार किए गए मसौदे तथा उसकी धाराओं पर विचार और बहस हुई। उसमें कौन-सी धाराएं
बदलनी होंगी, कौन-सी धारा को बढ़ाना होगा, किसकी शब्द
रचना को बदलना होगा यदि मसलों पर फुर्ती से निर्णय लिया गए"
भारत के संविधान को
बनाने में डॉ भीमराव अंबेडकर क्या योगदान रहा
कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि भारत के संविधान
के निर्माण में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का कोई भी योगदान नहीं रहा है कुछ महा मूर्ख
लोग अति उत्साह के साथ यह कहते हैं कि बी एन राव द्वारा भारत के संविधान की रचना
की गई है तो कुछ और उससे भी ज्यादा बड़े विद्वान है जो यह कहते हुए बड़ा गर्व
महसूस करते हैं कि भारत का संविधान अंग्रेजों द्वारा बनाए गए संविधान के ऊपर के
पन्ने को फाड़कर बस भारत का संविधान लिख दिया गया इसमें डॉ भीमराव अंबेडकर ने क्या
किया है किसी का नाम लेना ज्यादा जरूरी नहीं है कि ऐसी मूर्ख भरी बातें कौन कर रहा
है लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अक्सर ऐसी मूर्खों द्वारा डाले गए पोस्टों और
वीडियो को देखकर लगता है की ऐसी चर्चाएं भारत में कुछ मनुवादी विचारधारा के लोग
प्रचार और प्रचार कर रहेहैं। क्योंकि संविधान और बाबा साहब इन मनुवादियों के लिए
गले में हड्डी की तरह है जो ना तो मनुवादी निगल सक रहे हैं और उगल सक रहे हैं
मनुवादी विचारधारा के लोग इस बात को बिल्कुल भी पचाने को तैयार नहीं है की एक अछूत
इतने बड़े देश का इतना बड़ा संविधान कैसे लिख सकता है इसी क्रम में वह भी न राव को
झूठा क्रेडिट दे रहे हैं जबकि संविधान सभा में संविधान को बनाने में लगभग 299
लोगों की मौजूदगी में दौरान बहस लागू हुआ और यह जिन्होंने संसद की कभी शक्ल नहीं
देखी वह संविधान निर्माता पर उंगली उठा रहे हैं जबकि श्री टी०टी० कृष्णम्माचारी जो
कि संविधान सभा के सदस्य थे उन्होंने संविधान सभा में कुछ इस प्रकार से कहा है
(अंबेडकर वॉल्यूम 40 पृष्ठ सं- 93) कि- "सदन को अहसास होगा कि आपके द्वारा
नियुक्त किए गए सात में से एक सदस्य ने इस्तीफा दिया। उनकी जगह अन्य की नियुक्ति
की गई। एक सदस्य की मृत्यु हुई, लेकिन उस पद को भरा
नहीं गया। एक सदस्य अमेरिका में थे उनकी जगह किसी को नहीं दी गई। एक और सदस्य
रियासत के कामों में उलझे हुए थे, इसलिए उनकी जगह भी
खाली थी। एक या दो सदस्य दिल्ली से काफी दूर रहा करते थे और उनकी सेहत ठीक नहीं थी
इसलिए वह भी उपस्थित नहीं रह पा रहे थे। सो अंततः संविधान बनाने की जिम्मेदारी
पूरी तरह डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर पर आई। उन्होंने यह काम पूरी जिम्मेदारी के साथ
सफलतापूर्वक पूरा किया। उनका यह कार्य प्रशंसनीय है, इसमें कोई
दो राय नहीं। हम सब उनके प्रति कृतज्ञ हैं।" अपने इस भाषण में श्री
टी०टी० कृष्णम्माचारी के इस भाषण से स्पष्ट हो जाता है कि भारत के संविधान को
बनाने में बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर ने बड़ी जिम्मेदारी और स्वास्थ्य खराब होने
के बाद भी उन्होंने अकेले ही भारत के संविधान की रचना की है इसलिए संविधान के
रचनाकार किसी और को बताना बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के साथ नाइंसाफी होगी।
संविधान सभा में
संविधान के रचनाकार डॉक्टर भीमराव अंबेडकर हैं यह सिर्फ श्री टी०टी० कृष्णमाचारी
ने ही नहीं कहा बल्कि बहुत सारे सदस्यों ने उनकी इस रचना को लेकर उनकी संविधान सभा
में बहुत प्रंशसा की और उनके पक्ष में वक्तव्य दिया उस वक्तव्य से यह झलकता है कि
भारत के संविधान के सही और असली रचयिता कौन है कुछ सदस्यों के भाषणों की झलकियां
अंबेडकर वॉल्यूम 40 पृष्ठ सं 93,135, ............
काजी
सैय्यद करीमुद्दीन: संविधान का मसौदा विचारार्थ रखने के प्रस्ताव पर डॉ.
अम्बेडकर ने भूमिका में जो वक्तव्य दिया, उसके लिए मैं उनका
अभिनंदन करता हूं। उनका भाषण ध्यान देने योग्य था और मुझे यकीन है कि आने वाली
पीढ़ियां उन्हें महान संविधानकर्ता के रूप में जानेगी।
डॉ. पी.
एस. देशमुख: मेरे सम्माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर का भाषण उच्चकोटि का था।
प्रस्तुत किए गए मसौदे पर दिया गया वह प्रभावपूर्ण वक्तव्य था। सब जानते ही हैं कि
वह एक प्रख्यात अधिवक्ता हैं और मुझे लगता है कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी
तरह से निभाई। अगर उन्हें पूरी छूट मिलती तो इस संविधान को वे शायद अलग रूप दे
पाते।
पंडित
ठाकुरदास भार्गव: "मसौदा समिति और उसके सभी सदस्यों के प्रति हमें
किस प्रकार कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है। कानून के
बारे में कुशाग्र बुद्धि, अथक परिश्रम, अति उच्च प्रकार का
कौशल, दृढ़ आत्मविश्वास, आधुनिकता के साथ इन
गुणों से युक्त मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने इस संविधान सभा
के माध्यम से नेतृत्व किया और इस संदर्भ में निर्माण हुए सभी उलझी गुत्थियों को हल
किया।"
बेगम ऐज़ाज
रसूल: "संविधान ने भारतीय जनता की आशाओं और आकांक्षाओं को मूर्त
रुप प्रदान किया है। शब्दों योजना, प्रावधानों की
कसौटियों पर संविधानों का अगर मूल्यांकन करना हो तो दुनिया के संविधानों में ये
संविधान श्रेष्ठ प्रकार का साबित होगा। इस बारे में हमारे मन में संविधान के प्रति
जो गर्व की भावना है वह न्यायोचित ही कहलाएगी। इस मेहती मार्गदर्शक कार्य के लिए
मैं डॉ. अम्बेडकर और मसौदा समिति के सदस्यों का अभिनंदन करती हूं।
संविधान के
मशहूर विशेषज्ञ एस. वी. पायली: ने कहा अपनी विद्वत्ता, कल्पनाशक्ति, तर्कनिश, वाकपटुता
और अनुभवों को डॉ. अम्बेडकर ने दांव पर लगाया। बेहद कठिन सवाल पर भी उनका जबरदस्त
उत्तर हुआ करता था। वह बड़े ही प्रभावकारी ढंग से और आसानी से अपनी राय सामने
रखते। दुनिया के सभी विकसित देशों के संविधानात्मक कानूनों का और उन पर किए गए अमल
के बारे में उन्हें अच्छी जानकारी थी। साथ ही 1935 वाले कानून की सूक्ष्मता से
जानकारी थी। संविधान के मसौदे के बारे में जब चर्चा हो रही थी तब हर सवाल का वह
स्पष्ट तथा प्रभावी और आसान तरीके से जवाब देते थे। उनसे जवाब के बाद सदस्यों के
मन का संदेह, उलझन और कठिनाई दूर हो जाती। तर्क आधारित मुक्तियुक्त प्रभावी
तथा सब समझ सकें ऐसा स्पष्टीकरण, किसी भी मुद्दे का तुरंत उत्तर देकर मतभेद
को खत्म करने की कला केवल उनके ही पास थी किसी और सदस्य के पास नहीं। यह सब करते
हुए विरोधियों द्वारा अगर कोई सही मुद्दा पेश किया गया तो उसे जल्द-समझ कर
स्वीकारने की उदारता भी उनमें थी। इसीलिए उन्हें आधुनिक मनु या भारतीय संविधान के
जनक कहा जाता है, जो सही भी है।"
डॉ. जोसेफ
अल्बन डिसूजा: शुरुआत से लेकर आखिर तक विद्वानों को शोभा देने वाला, कार्यक्षम, स्वीकार
योग्य, तुलनात्मक नजरिए से श्रेष्ठ संस्मरणीय दस्तावेज डॉ. अम्बेडकर
और उनकी मसौदा समिति ने प्रस्तुत किया है।'
संविधान
सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद:26 नवंबर, 1949 के
दिन संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद का कार्यक्रम समापन भाषण होने के
बाद भारतीय संविधान पारित हुआ। जिनका जिक्र हमेशा भारतीय संविधान के शिल्पकार के
तौर पर किया जाता है जो कि बिल्कुल सार्थक है उन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का उससे
एक दिन पहले यानी 25 नवंबर, 1949 के दिन संविधान सभा में आखिरी भाषण
हुआ।
संविधान निर्माण के
लिए उन्हें कितना परिश्रम करना पड़ा इसका अंदाजा आगे दी गई खबर से लगता है -
"अंदाज है कि
17 तारीख को संविधान समिति का कामकाज स्थगित हो सकता है। संविधान सभा का कामकाज
अगर रुक गया तो डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को कुछ दिनों तक पूरी तरह आराम करना
पड़ेगा। आराम के लिए माईसाहब के साथ डॉ. बाबासाहेब शायद कश्मीर जाएंगे ऐसा लगता
है।"
संविधान सभा का
कामकाज जब चल रहा था तब डॉक्टरसाहब प्रतिदिन 12 से 14 घंटों तक काम किया करते थे।
इस साल के आखिर तक यानी 31 दिसंबर, 1949 के आसपास
उन्हें संविधान पारित करवाना है। क्योंकि, सभी संकल्प किया है
कि नया संविधान 26 जनवरी, 1950 के दिन लागू हो।'
संविधान निर्माण
में उनके योगदान और काम के लिए संविधान सभा के ज्यादातर सदस्यों द्वारा तथा समाचार
पत्र समूहों के इस क्षेत्र के जानकारों द्वारा उनकी खूब प्रशंसा की गई। उनमें से
उद्धरण प्रस्तुत हैं"
संविधान को
बनाने में इतना समय क्यों लगा
संविधान को बनाने
में 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन का समय लगा कुछ आज के दौर के कुछ महा मूर्ख समाज
सुधारक या कहते हुए अक्सर सोशल मीडिया या तो अपने भाषणों में रहते हुए नजर आते हैं
कि संविधान को बनाने में 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन का समय क्यों लगा लिखने में इतने
समय की क्या आवश्यकता है। कुछ लोग इतने पर ही नहीं रुकते वह कुछ और आगे बढ़कर या
बोलते हैं कि इतने समय में तो हम कई देशों के संविधान लिख सकते हैं हमने ऐसी खबरें
अक्सर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर देखा है और पढ़ा है तथा सुना भी है लेकिन संविधान
को बनाने में जो या समय लगा वह बहुत कम समय था
संविधान निर्माता बाबा
साहब भीमराव अंबेडकर: संविधान सभा में अपने भाषण मैं कुछ इस
प्रकार से कहा है (अंबेडकर वॉल्यूम 40 पृष्ठ सं- 139 आशिक भाग)
संविधान
सभा की पहली बैठक दिनांक 9 दिसंबर, 1946 को हुई। इस
बात को आज 2 वर्ष 11 महीने और 17 दिन बीते हैं। इस दरमियान संविधान सभा के कुल 11
सत्र हुए हैं। इन 11 सत्रों में 6 सत्र संविधान की भूमिका का प्रस्ताव पारित करने
और मौलिक अधिकार, केंद्रीय संविधान, केंद्र के
अधिकार, प्रांतीय संविधान, अल्पसंख्यक समिति
की रिपोर्ट तथा अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित जनजातियों पर विचार-विमर्श करने में
बीते। सात, आठ, नौ, दस और ग्यारहवें
सत्र का उपयोग मसौदा संविधान पर विचार-विनिमय के लिए किया गया।
संविधान सभा ने 29
अगस्त, 1947 के दिन मसौदा समिति को चुना। उसकी पहली बैठक 30 अगस्त के
हुई। 30 अगस्त, से 141 दिनों तक कामकाज चला। इस दरमियान समिति संविधान का
मसौदा तैयार करने के काम में व्यस्त रही। संविधान सलाहकारों ने कामकाज के लिए
ढांचा मसौदा समिति को सौंपा तब मसौदा संविधान में 243 अनुच्छेद और 13 परिशिष्ट थे।
मसौदा समिति द्वारा संविधान सभा को प्रस्तुत किए। पहले मसौदा संविधान में कुल 315
अनुच्छेद और 8 परिशिष्ट शामिल थे। विचार-विमर्श के आखरी दौर में मसौदा संविधान में
अनुच्छेदों की संख्या बढ़ कर 386 हुई। अंतिम स्वरुप में मसौदा संविधान में 395
अनुच्छेद और 8 परिशिष्ट शामिल रहे। मसौदा समिति में करीब 7635 सुधार सुझाए गए, उनमें से
2473 सुधार प्रत्यक्ष विचारार्थ सदन में प्रस्तुत किए गए।
इन वास्तविक
स्थितियों का मैं केवल इसलिए जिक्र कर रहा हूं क्योंकि किसी समय ऐसा कहा जाता था
कि अपना काम पूरा करने के लिए समिति ने अत्यधिक समय लिया। वह बेहद धीमी गति से काम
करती रही। जनता का धन बेहिसाब खर्च करती रही। रोम जब जल रहा था तब जैसे नीरो फिडल
बजाता बैठा था बिल्कुल उसी तरह के हालात समिति के भी होने के बातें कही जा रही
थीं। क्या इन आरोपों में सच्चाई है? अन्य देशों की
संविधान समितियों द्वारा संविधान बनाने के लिए कितना समय लिया इस पर आइए, एक नजर
डालते हैं। कुछ उदाहरण देखते हैं। अमेरिका की समिति की पहली बैठक 25 मई, 1787 को
हुई थी। चार महीनों में अर्थात् 17 सितंबर, 1787 को उन्होंने
अपना काम पूरा किया। कनाडा की संविधान सभा की पहली बैठक 10 अक्तूबर, 1864 को
हुई और मार्च, 1867 में संविधान का कानून में परिवर्तन हुआ। अर्थात् 2 साल 5
महीनों का समय लगा। ऑस्ट्रेलिया के संविधान निर्माण का काम मार्च 1891 में शुरु
हुआ और 9 जुलाई, 1900 में उनके संविधान को कानून का स्वरूप मिला। इसके लिए
उन्हें 9 वर्ष का समय लगा। दक्षिण अफ्रीका के संविधान निर्माण के काम की शुरुआत
अक्तूबर, 1908 में हुई और 20 सितंबर, 1909 में उनके
संविधान को कानून का स्वरुप प्राप्त हुआ। एक साल के परिश्रम से उन्होंने यह काम
पूरा किया। यह बात सही है कि अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका की संविधान समितियों
द्वारा लिए गए समय से हमने अधिक समय लिया। लेकिन कनाडा की संविधान सभा से हमने
अधिक समय नहीं लिया और ऑस्ट्रेलिया की संविधान सभा की तुलना में हमने बहुत ही कम
समय लिया। किसने कितना समय लिया इस बारे में सोचते समय दो बातों पर ध्यान दिया
जाना जरूरी है। पहली बात यह कि अमेरिका, कनाडा, दक्षिण
अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया इन देशों के संविधान हमारे देश के संविधान से बहुत छोटे
हैं। जैसा कि मैंने बताया कि हमारे संविधान में 395 अनुच्छेद हैं। अमेरिकी संविधान
में केवल 7 अनुच्छेद हैं। उनमें से पहले 4 अनुच्छेदों को 21 उपविभागों में विभाजित
किया गया है। कनाडा के संविधान में 147, ऑस्ट्रेलिया के
संविधान में 128 और दक्षिण आफ्रिका के संविधान में 153 अनुच्छेद हैं। एक और बात पर
ध्यान दिया जाना जरूरी है कि इन चारों देशों के संविधान निर्माताओं को संविधान सुधार
के सवालों का सामना नहीं करना पड़ा था। जिस स्वरूप में प्रस्तुति की गई उसी रूप
में उन्हें स्वीकृति मिली। दूसरी तरफ हमारी संविधान सभा को 2473 सुधारों पर विचार
करना पड़ा। इस वास्तविकता को ध्यान में रखें तो देरी का आरोप मुझे निराधार है।
इतने कम समय में इतना कठिन कार्य पूरा करने के लिए समिति खुद का अभिनंदन करे तो
उसमें कुछ गलत नहीं कहा जा सकता।
भारत के संविधान की
कुछ खास विशेषताएं जिसके कारण हमारे देश का संविधान विश्व का सर्वोत्तम तथा
उत्कृष्ट संविधान के रूप में जाना जाता है।
अनुच्छेद 32 क्या है बाबा साहब ने यह
कहा था कि भारत के संविधान की आत्मा माना और कहा कि अनुच्छेद 32 "यदि मुझसे
पूछा जाए कि इस संविधान में सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद कौन सा है – एक ऐसा
अनुच्छेद जिसके बिना यह संविधान शून्य हो जाएगा – तो मैं किसी अन्य
अनुच्छेद का उल्लेख नहीं कर सकता, सिवाय इसके। यह संविधान की आत्मा और हृदय
है।" यह टिप्पणी उन्होंने संविधान सभा में बहस के दौरान की थी। डॉ.
अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को इतना महत्वपूर्ण माना क्योंकि: अनुच्छेद 32 नागरिकों को
मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) के उल्लंघन के
खिलाफ सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जाने का अधिकार देता है। यह संवैधानिक उपचार (Constitutional
Remedy) का अधिकार है, जो अन्य मौलिक
अधिकारों को प्रभावी बनाता है। बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर ने देखा कि भारत जैसे देश
में, जहाँ सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ गहरी हैं, सरकार या
अन्य संस्थाएँ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकती हैं। अनुच्छेद 32 नागरिकों को
ऐसी मनमानी के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है। जबकि बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर की यह
टिप्पणी संविधान सभा में तब आई, जब कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया कि अनुच्छेद
32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति को सीमित किया जाए। बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर
ने इसका विरोध किया और कहा कि यह अनुच्छेद संविधान की रीढ़ है।
अनुच्छेद
32 की खास बात
अनुच्छेद 32 को "संवैधानिक
उपचार का अधिकार" (Right to Constitutional Remedies) कहा जाता
है। यह भाग III (मौलिक अधिकार) का हिस्सा है और इसे मौलिक अधिकार माना गया है।
इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
अनुच्छेद
32(1): यह नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय में
याचिका दायर करने का अधिकार देता है।
अनुच्छेद
32(2): सर्वोच्च न्यायालय को रिट (Writs) जारी करने की शक्ति
देता है, जैसे:
हेबियस
कॉर्पस (Habeas Corpus): अवैध हिरासत से मुक्ति।
मैंडमस (Mandamus):
सार्वजनिक
प्राधिकरण को कर्तव्य पालन के लिए निर्देश।
प्रोहिबिशन
(Prohibition): निचली अदालतों को उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर काम करने
से रोकना।
सर्टियोरारी
(Certiorari): निचली अदालतों के निर्णय को रद्द करना।
क्वो-वारंटो
(Quo Warranto): किसी व्यक्ति के सार्वजनिक पद पर अधिकार की वैधता की
जाँच।
अनुच्छेद
32(3): संसद अन्य अदालतों को रिट जारी करने की शक्ति दे सकती है, लेकिन
सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति अप्रभावित रहती है।
अनुच्छेद
32(4): इस अधिकार को केवल संवैधानिक प्रक्रिया (जैसे आपातकाल के तहत) द्वारा
निलंबित किया जा सकता है।
संविधान में अनुच्छेद
32 का महत्व और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय
अनुच्छेद 32 ने
भारत में संवैधानिक लोकतंत्र को मजबूत किया है। यह नागरिकों को सरकार, संस्थाओं, या व्यक्तियों
द्वारा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ त्वरित न्याय प्राप्त करने का साधन
प्रदान करता है। नीचे इसके महत्व को प्रमुख सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और
सटेशन (Citation) के साथ समझाया गया है:
सर्वोच्च न्यायालय
के प्रमुख निर्णय
A. (Romesh
Thappar v. State of Madras, 1950): AIR 1950 SC 124 मद्रास
सरकार ने एक पत्रिका पर प्रतिबंध लगाया, जिसे अनुच्छेद
19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का उल्लंघन माना गया। निर्णय:
सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 32 के तहत याचिका स्वीकार की और प्रतिबंध को रद्द
किया। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक शक्तिशाली
हथियार है।
B. (ADM
Jabalpur v. Shivkant Shukla, 1976): AIR 1976 SC 1207 आपातकाल
(1975-77) के दौरान अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) को निलंबित किया
गया था। याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 32 के तहत अवैध हिरासत को चुनौती दी। निर्णय:
बहुमत (4:1) ने कहा कि आपातकाल में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर नहीं की जा
सकती। जस्टिस एच.आर. खन्ना ने असहमति जताई और कहा कि अनुच्छेद 21 का निलंबन भी
कानून के शासन को समाप्त नहीं करता। यह विवादास्पद निर्णय था, लेकिन
जस्टिस खन्ना की असहमति ने बाद में अनुच्छेद 32 और 21 की महत्व को मजबूत किया। इस
मामले ने आपातकाल के बाद न्यायिक सुधारों को प्रेरित किया।
C. Kesavananda
Bharati v. State of Kerala) AIR 1973 SC 1461 (1973) 4 SCC 225 निर्णय की
तारीख: 24 अप्रैल 1973 इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने
शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ 1951 तथा गोलकनाथ बना पंजाब राज्य 1967 के आदेशो को
पलट दिया और कहा कि संसद के पास संविधान में संशोधन करने की शक्ति है जो अनुच्छेद
368 में निहित है लेकिन सांसद की संशोधन शक्ति असीमित नहीं है सांसद संविधान के
किसी भी प्रावधान में संशोधन कर सकती है लेकिन संविधान के मूल ढांचे को नष्ट या
विकृत नहीं कर सकती।
इसी तरह जैसे की
सर्वोच्च न्यायालय के पास अनुच्छेद 32 के अधीन असीमित शक्तियां हैं जो की
संवैधानिक रूप से भारत की जनता को दिए गए मूल अधिकारों के उल्लंघन करने पर सीधे
सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद 32 के अंतर्गत रिट दायर कर सकते हैं। ठीक उसी तरह भारत के सभी
उच्च न्यायालय के पास अनुच्छेद 226 के अंतर्गत सभी उच्च न्यायालय को संविधान
द्वारा संवैधानिक शक्ति प्रदान की गई है लेकिन अनुच्छेद 226 के तहत व्यापक
शक्तियां हैं जबकि अनुच्छेद 32 के तहत केवल मौलिक अधिकारों तक ही सीमित रखा गया
है।
भारत के संविधान में अनुच्छेद 17
अस्पृश्यता का अंत के कुछ निर्णय की संक्षिप्त जानकारी-
A. People’s
Union for Democratic Rights v. Union of India, 1982 AIR 1982 SC 1473; (1982) 3 SCC 235 इस
मामले में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों, विशेष रूप से दलित
और आदिवासी समुदायों के शोषण पर चर्चा हुई। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि
श्रमिकों के साथ अस्पृश्यता जैसा व्यवहार किया जा रहा था। आदेश: शीर्ष अदालत ने
अनुच्छेद 17 की व्यापक व्याख्या की और कहा कि यह न केवल स्पष्ट अस्पृश्यता (जैसे
मंदिर प्रवेश या सामाजिक बहिष्कार) को रोकता है, बल्कि सामाजिक और
आर्थिक शोषण के उन रूपों को भी, जो दलित समुदायों की गरिमा को प्रभावित करते
हैं अदालत ने अनुच्छेद 17 को अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन
और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के साथ जोड़ा। यह कहा गया: "अस्पृश्यता
का उन्मूलन संविधान की आत्मा है, और इसे लागू करने के लिए राज्य को सक्रिय
कदम उठाने चाहिए। इस निर्णय ने अनुच्छेद 17 के दायरे को विस्तृत किया, जिसमें
सामाजिक और आर्थिक भेदभाव भी शामिल हो गया।
B. Safai
Karamchari Andolan v. Union of India, (2014) 11 SCC 224 यह मामला
मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मैला ढोने की प्रथा) के खिलाफ था, जो मुख्य
रूप से दलित समुदायों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों द्वारा किया
जाता था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह प्रथा अनुच्छेद 17 का उल्लंघन है। आदेश: शीर्ष अदालत
ने स्पष्ट रूप से कहा कि मैनुअल स्कैवेंजिंग अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता का एक
रूप है, क्योंकि यह दलित समुदायों को अपमानजनक कार्य में बाध्य करता
है अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को मैनुअल स्कैवेंजिंग को
समाप्त करने और प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऐज मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर
रिहैबिलिटेशन एक्ट, 2013 को सख्ती से लागू करने का निर्देश
दिया। यह कहा गया:
"मैनुअल स्कैवेंजिंग न केवल अनुच्छेद 17 का उल्लंघन है, बल्कि यह
अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का भी हनन करता है।"अदालत ने
प्रभावित समुदायों के लिए पुनर्वास और वैकल्पिक रोजगार के लिए दिशानिर्देश
दिए।महत्व: इसने अनुच्छेद 17 को आधुनिक संदर्भ में लागू किया और सामाजिक प्रथाओं
को अस्पृश्यता के दायरे में शामिल किया।
निष्कर्ष
भारत का संविधान केवल एक कानूनी
ढाँचा नहीं है, बल्कि यह
राष्ट्रीय एकता, विविधता का
सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का प्रतिनिधित्व करता
है। यह एक ऐसी आधारशिला है जिस पर आधुनिक भारत का निर्माण हुआ है और जो देश के
नागरिकों के लिए एक न्यायपूर्ण और समतावादी समाज के निर्माण की दिशा में निरंतर
मार्गदर्शन करता है। इसकी सफलता न केवल इसके प्रावधानों में, बल्कि भारतीय
नागरिकों की इसके सिद्धांतों को बनाए रखने की दृढ़ इच्छाशक्ति में भी निहित है इतना ही
नहीं जिन लोगों को ऐसा महसूस होता है कि संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर नहीं
है तो उन्हें इतिहास पढ़ने और जानने की सबसे ज्यादा जरूरत है खास तौर पर संविधान
सभा में हुए डिबेट की पुस्तक बाजार से अवश्य ले लें और उसे पढ़े संविधान को बनाने
में बाबा साहब ने कितना संघर्ष किया और किन-किन सवालों का जवाब दिया कितने समय तक
काम किया कितने दिनों तक काम किया। हम भी मानते हैं कि संविधान सभा के सभी सदस्यों
का हाथ था पर उन्होंने बाबा साहब द्वारा लिखे गए संविधान के प्रत्येक अनुच्छेदों
पर बहस के दौरान सहमति और आज सहमति दर्ज की इसी का परिणाम रहा कि भारत के संविधान
को बनाने में 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन लग गए क्योंकि भारत के संविधान में लगभग
मसौदा समिति में करीब 7635 सुधार सुझाए गए उनमें से 2473 सुधार प्रत्यक्ष विचार
अर्थ सदन में प्रस्तुत किए गए तो जिस संविधान में कितने ज्यादा सुधार और सुधार के
सुझाव दिए गए हो तो उसमें 299 लोगों की भूमिका तो हम है लेकिन लिखने वाले की
भूमिका सिर्फ एक की है और रही बात बी0 एन0 राव की तो
उनका भी योगदान अमूल्य है वह एक विद्वान महापुरुष थे इसमें कोई शंका नहीं है लेकिन
संविधान उन्होंने नहीं लिखा है यह बात अच्छी तरह से लोगों को जान लेनी चाहिए
इसीलिए भारत का बहुसंख्यक वर्ग भारत के संविधान को बाबा साहब का संविधान कहता है
और यह कोई गलत बात नहीं है।
एडवोकेट हाईकोर्ट इलाहाबाद
मो०नं०-9532112005

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