हिंदू कोड बिल औरडॉ. बी.आर. अंबेडकर: सामाजिक क्रांति का एक अधूरा स्वप्न

 


हिंदू कोड बिल औरडॉ. बी.आर. अंबेडकर: सामाजिक क्रांति का एक अधूरा स्वप्न

डॉ. भीमराव अंबेडकर केवल भारतीय संविधान के निर्माता ही नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक भारत के सबसे बड़े समाज सुधारक और नारीवादी विचारकों में से एक थे। डॉ. अंबेडकर का मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि सामाजिक लोकतंत्र न हो। उन्होंने महसूस किया कि जाति व्यवस्था और लैंगिक भेदभाव को समाप्त किए बिना भारत एक आधुनिक राष्ट्र नहीं बन सकता। इसी उद्देश्य से, उन्होंने 'हिंदू कोड बिल' का मसौदा तैयार किया, जिसका उद्देश्य हिंदू पारिवारिक कानूनों को संहिताबद्ध (Codify) करना और उन्हें न्यायसंगत बनाना था। हिंदू कोड बिल को संसद में औपचारिक प्रस्तुति (5 फरवरी 1951) किया गया था।

भारत की आजादी के बाद, स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में उनका सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी कदम 'हिंदू कोड बिल' को पेश करना था। यह बिल हिंदू समाज की पितृसत्तात्मक संरचना को चुनौती देने और महिलाओं को कानूनी रूप से सशक्त बनाने का एक साहसिक प्रयास था क्योंकि भारत में मुस्लिम धर्मानुवाई के लिए (मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937) और ईसाई धर्मानुवाई लोगों के लिए (ईसाइयों के विवाह भारत में 'भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872') इसी जिनका अपना खुद का कानून है लेकिन हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जिसे अपना कोई कानून नहीं है वह परंपरा और रीति-रिवाज के अनुसार अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग परंपराओं का निर्वहन कर रहा है जैसे हिन्दू महिलाओं को संपत्ति में कोई अधिकार नहीं था, हिंदू धर्म में विवाह विच्छेद की परिस्थितियों, हिंदू धर्म में दत्तक विधान और संरक्षता, हिंदू स्त्रियों को दयाभागाधिकार और हिंदू पुत्रियो को दयाभागाधिकार इन सभी प्रावधानों को लेकर बाबा साहब भीमराव डॉ अंबेडकर ने हिंदू कोड बिल की रचना कि लेकिन हिंदू कोड बिल और डॉ अंबेडकर का अछूत होना या सबसे बड़ी समस्या हिंदू कोड बिल को लेकर थी इसीलिए   डॉ अंबेडकर का विरोध होने के साथ-साथ कट्टर हिंदू तथा कट्टर आर्य समाज हिंदू लोग हिंदू कोड बिल का बहुत विरोध किया यहां तक की भारत के कट्टर हिंदू लोगों ने भारतीय पार्लियामेंट में प्रस्तुत हिंदू कोड बिल के विरोध में घर आंदोलन चलाया यह आंदोलन सिर्फ दिल्ली तक ही सीमित नहीं रहा भारत के सभी राज्यों और सभी जिलों में डॉ आंबेडकर तथा हिंदू कोड बिल के विरोध में कट्टर हिन्दू समर्थकों ने मुर्दाबाद के नारे लगाए कुछ नहीं तो नारे लगाने के साथ-साथ अपनी मूर्खता का कुछ इस प्रकार भी अपने मूर्खता का परिचय दिया और यह भी कह दिया कि हिंदू कोड बिल हिंदू धर्म का विनाश कर देगा इसलिए स्थिति चाहे जैसी भी हो हिंदू कोड बिल को पार्लियामेंट में पारित नहीं होने दिया जाएगा इस प्रकार के शब्दों के साथ कट्टर हिंदू विरोधी लोगों ने डॉ अंबेडकर तथा हिंदू कोड बिल का विरोध किया इसी विरोध के कड़ियों में कुछ ऐसे भी हिंदू थे जिन्होंने हिंदू कोड बिल का समर्थन किया जिसमें से- "पं० विद्यावाचस्पति नाम के व्यक्ति जिन्होंने हिंदी दैनिक समाचार पत्र जिसका नाम वीर अर्जुन मैं कुछ इस प्रकार से कहा है कि मुझे यह देखकर बहुत दुख होता है कि इस बिल के संबंध में सत्य प्रचार बहुत अधिक किया जा रहा है प्राय इसके विरोधी ऐसे हैं जिन्हें ध्यान पूर्वक बिल की धाराओं को पढ़ने का भी कष्ट नहीं उठाया और वह हिंदू धर्म और संस्कृत संकट में इस प्रकार के नारे को लगाकर सर्वसाधारण जनता को उत्तेजित करने का अनुचित प्रयत्न कर रहे हैं"

मैं समझता हूं कि कट्टर हिंदू समर्थक सिर्फ चिल्लाते हैं कि हमारा धर्म सनातन है, बहुत प्राचीन है, बहुत पुराना है, सबसे पहला धर्म हिंदू धर्म है, इन प्रकार के शब्दों में तो मुझे हंसी आती है हंसी इसलिए आती है क्योंकि यदि हिंदू धर्म सबसे पुराना है तो धर्म को मानने वाले लोगों का अपना कानून पुराना क्यों नहीं यदि इंटरनेट पर भी सर्च करें तो आपको ईसाई धर्म तथा मुस्लिम धर्म जिसे हिंदू धर्म के कट्टर समर्थक पुरजोर विरोध करते हैं उनका कानून सबसे पुराना कानून "मुस्लिम धर्मानुवाई के लिए (मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937) और ईसाई धर्मानुवाई लोगों के लिए (ईसाइयों के विवाह भारत में 'भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872)" लगभग मुस्लिम तथा ईसाई कानून को बने हुए लगभग 100 वर्ष से ज्यादा समय बीत चुका हैं लेकिन हिंदू कानून 1955 में बना और उसको बनाने का श्रेय सिर्फ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को जाता है कट्टर हिंदू समर्थक जो सवर्ण समाज (ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य) से आते हैं यह सभी लोग हिंदू कोड बिल के विरोधी नहीं थे वह सिर्फ इस बात के विरोधी थे कि हिंदू कोड बिल के रचनाकार डॉ आंबेडकर हैं और डॉ  अंबेडकर एक अछूत समाज से आते हैं जिससे उनकी जातिवादी मानसिकता और छुआछूत इन कट्टरवादी हिंदुओं के विचारों में स्पष्ट छलक रहा था दूसरे शब्दों में यह कहा जाएगी हिंदू धर्म जिसकी समस्त व्यवस्थाओं के जनक स्वयं ईश्वर है उसी धर्म की प्राचीन परंपरा का अनादर हो जाएगा जब एक अछूत व्यक्ति हिंदू धर्म को कानूनी रूप से संहिताबद्ध करें बस लोगों को इतनी ही बात स्वीकार नहीं थी।

हिंदू कोड बिल का उद्देश्य

 बाबा साहब डॉ. आंबेडकर द्वारा हिंदू कोड बिल तैयार करने का उद्देश्य भारतीय समाज में विशेष रूप से हिंदू समाज के पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को आधुनिक, न्यायपूर्ण और समानतापूर्ण बनाना था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र बना, जहाँ संविधान ने सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार दिया। लेकिन सामाजिक जीवन, विशेषकर विवाह, संपत्ति, उत्तराधिकार और पारिवारिक संबंधों के मामलों में महिलाओं और निम्न वर्गों के साथ गहरी असमानता मौजूद थी। हिंदू व्यक्तिगत कानून प्राचीन परंपराओं, शास्त्रीय व्याख्याओं और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों पर आधारित थे, जिनमें एकरूपता नहीं थी और महिलाओं को बहुत सीमित अधिकार प्राप्त थे। बाबा साहब डॉ. आंबेडकर का मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी सफल होगा जब सामाजिक लोकतंत्र भी स्थापित किया जाए। हिंदू समाज में उस समय महिलाओं की स्थिति अत्यंत कमजोर थी। विवाह को अविच्छेद्य माना जाता था, इसलिए तलाक का अधिकार लगभग नहीं था। पुरुषों को बहुविवाह की अनुमति थी जबकि महिलाओं के लिए यह असंभव था। संपत्ति में बेटियों और पत्नियों के अधिकार अत्यंत सीमित थे और अधिकांश संपत्ति पर केवल पुरुषों का नियंत्रण होता था। विधवाओं की स्थिति भी सामाजिक और आर्थिक रूप से असुरक्षित थी। डॉ. आंबेडकर ने महसूस किया कि यदि महिलाओं को समान अधिकार नहीं दिए गए तो संविधान में घोषित समानता केवल कागज़ी सिद्धांत बनकर रह जाएगी। इसलिए हिंदू कोड बिल का एक प्रमुख उद्देश्य लैंगिक समानता स्थापित करना था।

इस बिल के माध्यम से विवाह संस्था को कानूनी और नैतिक आधार पर पुनर्गठित करने का प्रयास किया गया। इसमें एकपत्नी प्रथा (monogamy) को बढ़ावा दिया गया ताकि पुरुष और महिला दोनों के अधिकार समान हों। तलाक की व्यवस्था को शामिल कर विवाह को एक सामाजिक अनुबंध के रूप में स्वीकार करने की दिशा में कदम उठाया गया, जिससे असफल या अत्याचारपूर्ण विवाह से बाहर निकलने का अधिकार दोनों पक्षों को मिले। यह उस समय के सामाजिक ढांचे में एक क्रांतिकारी परिवर्तन था क्योंकि पारंपरिक व्यवस्था विवाह को पूरी तरह धार्मिक और स्थायी बंधन मानती थी। हिंदू कोड बिल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य संपत्ति और उत्तराधिकार के कानूनों में सुधार करना भी था। डॉ. आंबेडकर चाहते थे कि बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में अधिकार मिले और महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया जाए। उनका मानना था कि आर्थिक स्वतंत्रता के बिना सामाजिक सम्मान संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने महिलाओं को संपत्ति का अधिकार देकर उन्हें परिवार और समाज में समान दर्जा दिलाने की कोशिश की। यह विचार उस समय के रूढ़िवादी समाज के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि पारंपरिक व्यवस्था पुरुष प्रधान थी। इसके अतिरिक्त, हिंदू कोड बिल का उद्देश्य विभिन्न प्रांतों और समुदायों में प्रचलित अलग-अलग हिंदू कानूनों को एक समान और आधुनिक कानूनी ढांचे में लाना भी था। भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग परंपराएँ लागू थीं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया जटिल हो जाती थी। आंबेडकर एक ऐसा कानून बनाना चाहते थे जो पूरे देश में समान रूप से लागू हो और आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हो। उनके अनुसार, कानून समाज सुधार का शक्तिशाली साधन है और राज्य का कर्तव्य है कि वह सामाजिक अन्याय को समाप्त करे।

हिंदू कोड बिल और बाबासाहेब अंबेडकर का विरोध करने वाले कुछ इस प्रकार से अपना विरोध सदन के अंदर और सदन के बाहर प्रस्तुत किया।

प्रभुदत्त ब्रह्मचारी और स्वामी करपात्री महाराज "हालांकि ये संसद के सीधे सदस्य नहीं थे, लेकिन इन्होंने बाहर से इतना भारी दबाव बनाया कि संसद के भीतर के विरोधियों को बल मिला। करपात्री महाराज ने देशभर में रैलियां कीं और बिल को 'धर्म विरोधी' बताया।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद (तत्कालीन राष्ट्रपति) "यद्यपि वे राष्ट्रपति थे और सीधे बहस में हिस्सा नहीं ले सकते थे, लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू को पत्र लिखकर इस बिल पर अपनी सख्त आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका तर्क था कि इस तरह के क्रांतिकारी बदलाव लाने का अधिकार वर्तमान अंतरिम संसद को नहीं है, इसे नई चुनी हुई सरकार पर छोड़ देना चाहिए।"

नजीरुद्दीन अहमद "उन्होंने 'मिताक्षरा' संयुक्त परिवार प्रणाली के टूटने का डर जताया।"

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेय (पश्चिम बंगाल सामन्य सीट): माननीय (यहां पर बहन श्रीमती जी दुर्गाबाई जो कि हिंदू कोड बिल और डॉ अंबेडकर का सदन ने समर्थन किया था उनको संबोधित किया गया है) बहन मेरे सामने यह कहती हैं कि यही कारण है जिसके फलस्वरूप मुझे हिंदू संहिता का समर्थन करना चाहिए। क्या मैं यह कह सकता हूँ कि यही वह कारण है जिसके फलस्वरूप में हिंदू संहिता का विरोध कर रहा हूँ। यह मुख्य कारणों में से एक कारण है। आपको तार्किक होना चाहिए। मैं अपनी बहनों की भावनाओं को समझ सकता हूँ। यह मत सोचिए कि मैं महिलाओं से नफरत करता हूँ, कि मैं नारी विरोधी हूँ या मेरे हृदय में महिलाओं के लिए भावनाएं नहीं हैं। (एक माननीय सदस्यः वह विवाहित पुरुष हैं।) जी हां, मैं विवाहित पुरुष हूँ। मेरी पत्नी नरम स्वभाव की है। मेरा विवाह हिंदू शास्त्र पद्धति से सम्पन्न हुआ था। मेरी हिंदू परिवार के आदशों के अनुसार पाल-पोस कर बड़ी हुई सरल और निष्कपट महिला पत्नी है। (माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर कैसी दयनीय स्थिति है) हो सकता है. आपको दयनीय लगे, परन्तु मुझे लेंवेंडर, लिपस्टिक और वैनिटी बैग या सेक्स की विविधताओं के लिए प्रेम करना पसन्द नहीं है। मैं प्रसन्न हूँ और मुझे विश्वास है कि प्रति सौ हिंदू घरों में से 98 घरों में इस प्रकार की पलियां हैं और वे प्रसन्न हैं (एक माननीय सदस्य: 98 ही क्यों? 99.9 प्रतिशत ऐसी ही हैं।) मुझे यह सुनकर प्रसन्नता है कि मेरे एक मित्र का कहना है कि 99.9 प्रतिशत ऐसी ही हैं। यह बात मेरी दलील की पुष्टि करती है। अतः मैं अपने माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर को बता सकता हूँ कि मुझे उन बड़े परिवर्तनों को करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई है जो उन्होंने इस विधेयक में करने का विचार किया है। (माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैंने भी ऐसा महसूस नहीं किया है।) मेरे माननीय मित्र कहते हैं कि वे भी इसकी आवश्यकता महसूस नहीं करते। यदि वे भी इन बड़े परिवर्तनों की वास्तव में आवश्यकता महसूस नहीं करते, तो क्या मैं यह मान लूं कि उनकी महत्वाकांक्षा के कारण हमें यह हिंदू संहिता विधेयक मिला है? मैं अपने मित्र डॉ. अम्बेडकर का अत्यंत प्रशंसक हूँ। इस विधानसभा से पूर्व कई वर्षों तक मुझे उनके साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मैं उनका आदर करता हूँ। मैं जानता हूँ कि संविधान अधिनियम के संबंध में वह प्रतिदिन कितना अधिक परिश्रम कर रहे हैं। (माननीय सदस्यः वाह! वाह !!) मैं उनकी प्रशंसा करता हूँ। मैं उनको साधुवाद देता हूँ। परन्तु मैं इस बात की प्रशंसा नहीं करता जो उन्होंने उस सामाजिक विधान के संबंध में किया है और वास्तव में हिंदू समाज को तोड़ देगा, क्योंकि उसमें ऐसे क्रान्तिकारी परिवर्तन किए गए हैं, जिन्हें हममें से कुछ सदस्य अब महसूस कर सकते हैं। (माननीय सदस्यगणः क्रान्ति नहीं। बिलकुल नहीं। जी हां, मैं प्रसन्न हूँ कि नहीं-नहीं की आवाज़ उठी है। यदि यह विधेयक पारित होकर कानून में बदल जाता है, तोबाबू रामनारायण सिंह (बिहार सामान्य): नहीं?

पडित लक्ष्मीकांत मैत्रेय: क्या, नहीं।

बाबू रामनारायण सिंह यह पारित होकर कानून नहीं बनेगा।

पडित लक्ष्मीकांत मैत्रेय मैं देखूँगा। यदि यह विधेयक पारित होकर यथावत कानून बन जाता है, तो मैं देखूंगा कि कौन बेहतर भविष्यवक्ता है मैं, या वे लोग, जो 'नहीं-नहीं' कहते हैं।

अनंतशयनम आयंगर "जो बाद में लोकसभा अध्यक्ष भी बने, उन्होंने भी बिल का विरोध किया।"

हिंदू कोड बिल को सदन में पारित होने में जितना समय लगा है शायद ही आज तक आजादी के लगभग 78 वर्ष बीत जाने के उपरांत भी शायद ही ऐसा कोई कानून रहा होगा जबकि हिंदू कोड बिल को पारित होने में लगभग 8 से 9 वर्ष का लंबा समय लगा। डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा 1947 में इसे पेश करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, लेकिन यह 1955-1956 के दौरान ही पूर्ण रूप से अधिनियमित हो सका।जिसमें इतना अधिक समय लगा या अधिक समय लगने का मुख्य कारण सिर्फ रूढ़िवादी व्यवस्था और जातिवादी मानसिकता के लोगों के कारण था क्योंकि इस कानून का विरोध सिर्फ सदन के अंदर ही नहीं था सदन के बाहर भी था यहां तक की इस कानून के विरोध में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति में भी बड़ा मतभेद था तत्कालीन राष्ट्रपति का तर्क था कि इतने बड़े सामाजिक बदलाव का जनादेश नहीं है। उनका मानना था कि इस पर पहले आम चुनाव के बाद चर्चा होनी चाहिए। और इतना ही नहीं वे व्यक्तिगत कानूनों में राज्य के हस्तक्षेप के खिलाफ थे। उनका कहना था कि हिंदू समाज की सदियों पुरानी परंपराओं को बिना व्यापक चर्चा के नहीं बदलना चाहिए।

इसी देरी के कारण और हिंदू कोड बिल का सदन में पारित न होने के कारण बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने 27 सितम्बर 1951 को सदन से इस्तीफा दे दिया था इस्तीफा के समय का वक्तव्य-" हिंदू कोड बिल को पारित कराने की उम्मीद में ही मैं मंत्रिमंडल में रुका रहा, भले ही मेरे अन्य कई मतभेद थे। मुझे लगा कि अगर मैं रुकता हूँ, तो शायद इस ऐतिहासिक सुधार को सफल बना सकूँ।" क्योंकि बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर महिलाओं (महिलाओं से अर्थ है कि वे सभी महिलाएं चाहे किसी भी जाति अथवा धर्म की हो पर वह भारत की नागरिक हो) को उनका अधिकार दिलाने चाहते थे उन्होंने कहा था "किसी समाज की प्रगति को मैं उस प्रगति से मापता हूँ जो वहां की महिलाओं ने हासिल की है।" लेकिन पूरा सदन इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि बाबा साहब के जितना विद्वान उसे सदन में कोई नहीं है यह बात अच्छी तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू भी जानते थे इसीलिए बाबा साहब के इस्तीफा दे देने के बाद भी तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने बाबासाहेब अंबेडकर से आग्रह किया था कि जब तक यह कानून पारित नहीं होता है तब तक आप इस कानून के बहस के दौरान आप सदन में भाग लेते रहेंगे बाबा साहब अंबेडकर पहले ऐसे व्यक्ति थे जो सदन से इस्तीफा देने के बाद भी सदन के औपचारिक सदस्य के रूप में कार्य किया है अभी तक ऐसा सौभाग्य किसी भी सदन के सदस्य को नहीं प्राप्त है।

हिंदू कोड बिल के मुख्य प्रावधान

डॉ. अंबेडकर द्वारा प्रस्तुत इस बिल में चार प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया था:

महिलाओ को संपत्ति का अधिकार: संपत्ति बंटवारे अथवा संपत्ति के अधिकार पर बाबा साहब ने स्पष्ट कहा था कि इस नए कानून में वह पुराने सभी कानून खत्म हो जाएंगे जो भारत में धार्मिक रूप से मिताक्षरा और दया भाग पर आधारित संपत्तियों का बंटवारा होता था आई अब हम जानते हैं कि मिताक्षरा और दया भाग क्या होता है।

मिताक्षरा: इसमें पुत्र को पैतृक संपत्ति में जन्म से ही अधिकार मिल जाता है। यानी पुत्र पैदा होते ही परिवार की संपत्ति का सह-स्वामी (Coparcener) बन जाता है।

दयाभाग: इसमें संपत्ति पर अधिकार पिता की मृत्यु के बाद ही मिलता है। पुत्र का जन्म से कोई अधिकार नहीं होता; जब तक पिता जीवित है, वह संपत्ति का एकमात्र स्वामी है।

बाबा साहब ने हिंदू कोड बिल में दया भाग को वरीयता दी मिताक्षरा को नहीं और उन्होंने एक नए परिवर्तन किया की पिता की संपत्ति में पुत्री को भी उत्तराधिकारी होना चाहिए अर्थात पुत्र के समान पुत्री को भी पिता का धन का आधा हिस्सा दिया जाए इस पर सदन में हुई चर्चा (डॉ अंबेडकर संपूर्ण वाड्डयम हिंदी पृष्ठ सं-316)

हिंदू विवाह का कानूनी प्रावधान - हिंदू कोड बिल में बाबा साहब डॉ अंबेडकर ने बहु विवाह सिद्धांत, बहु पत्नी विवाह तथा बाल विवाह जैसी कुरीतियां जो सदियों से चली आ रही व्यवस्था का अंत किया इस कानून के माध्यम से अंत कर दिया।

तलाक का अधिकार: पारंपरिक हिंदू कानून में विवाह को एक 'अटूट बंधन' माना जाता था। । मनुस्मृति के अध्याय 9, श्लोक 101: के अनुसार "अन्योऽन्यस्याव्यभीचारो भवेदामरणान्तिकः। एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्रीपुंसयोः परः॥"(अर्थ: मृत्यु पर्यंत पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहना ही परम धर्म है।) अध्याय 9, श्लोक 46: मनु यह भी स्पष्ट करते हैं कि- न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्या विमुच्यते। एवं धर्मं विजानीमः प्राक्प्रजापतिनिर्मितम्॥ हिंदी अनुवाद: "न तो विक्रय (बेचने) से और न ही त्याग देने से पत्नी अपने पति के बंधन से मुक्त होती है; हमने इस धर्म (नियम) को ऐसा ही जाना है, जिसे प्राचीन काल में स्वयं प्रजापति (ब्रह्मा) ने बनाया था।" इसी प्रकार ऋग्वेद (10.85.36) का मूल श्लोक- गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः। भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः॥ हिंदी अनुवाद- "मैं (वर) सौभाग्य की वृद्धि के लिए तुम्हारा हाथ पकड़ता हूँ, ताकि तुम मेरे साथ वृद्धावस्था तक सुखपूर्वक जीवित रहो। भग, अर्यमा, सविता और पुरन्धि (विभिन्न देवता) ने तुम्हें गृहस्थ धर्म के पालन के लिए मुझे सौंपा है।" और  आगे यह भी हिन्दू शास्त्रो शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि- शतपथ ब्राह्मण 5.2.1.10) "तस्मादप्येतर्हि। अर्द्धों ह वा एष आत्मनो यत्पत्नी तस्माद्यावज्जायां न विन्दते नैतावत्प्रजायतेऽसर्वो हि तावद्भवत्यथ यदैव जायां विन्दतेऽथ प्रजायते तर्हि सर्वो भवति।" हिंदी अनुवाद "वह (पत्नी) वास्तव में स्वयं (पति) का आधा हिस्सा है। इसलिए जब तक मनुष्य पत्नी को प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक वह संतानोत्पत्ति नहीं कर सकता और तब तक वह अपूर्ण बना रहता है। लेकिन जैसे ही वह पत्नी को प्राप्त कर लेता है, वह पूर्ण हो जाता है।"  जिससे महिलाओं के लिए शोषणकारी रिश्तों से बाहर निकलना असंभव था। अंबेडकर ने कुछ विशेष परिस्थितियों में कानूनी तलाक का प्रावधान पेश किया। जो वर्तमान में कुछ इस प्रकार से है हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के अंतर्गत आते हैं। तलाक के अधिकार की मुख्य धाराएं:

धारा 13 (Contested Divorce): जब पति या पत्नी में से कोई एक पक्ष तलाक चाहता हो, तो वह इस धारा के तहत याचिका दायर कर सकता है। इसके मुख्य आधार (Grounds) हैं:

                                                                         I.            क्रूरता (Cruelty): शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना।

                                                                       II.            व्यभिचार (Adultery): जीवनसाथी का किसी अन्य के साथ संबंध होना।

                                                                    III.            परित्याग (Desertion): बिना किसी ठोस कारण के 2 साल या उससे अधिक समय से अलग रहना।

                                                                    IV.            धर्म परिवर्तन (Conversion): हिंदू धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेना।

                                                                      V.            मानसिक विकार (Mental Disorder): असाध्य पागलपन।

धारा 13-B (Mutual Consent Divorce): जब पति और पत्नी दोनों आपसी सहमति से तलाक लेना चाहते हों। इसमें 6 से 18 महीने का 'कूलिंग-ऑफ पीरियड' (प्रतीक्षा अवधि) होता है।

तलाक के मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश कुछ इस प्रकार से है- Nirmal Singh Panesar v. Paramjit Kaur Panesar @ Ajinder Kaur) 2023 INSC 905 / (2023) SCC OnLine SC 1297 कोर्ट ने शिल्पा शैलेश (2023) के फैसले को और गहराई से समझाया। कोर्ट ने कहा कि यदि पति-पत्नी दशकों से (इस केस में लगभग 36 साल से) अलग रह रहे हैं, तो ऐसी शादी का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यह "कानूनी रूप से जीवित लेकिन भावनात्मक रूप से मृत" (Legally alive but emotionally dead) संबंध है।

बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा यदि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 नहीं बनाया होता तो आज भारत में महिलाओं के साथ इसी प्रकार का कुछ आदेश आज भी पारित न्यायालय द्वारा किया जाता जैसा आजादी से पहले प्रिवी काउंसिल द्वारा निम्न आदेश पारित किया गया जो कुछ इस प्रकार से है

सती प्रसाद बनाम कली दासी AIR 1917 Cal 145: कलकत्ता उच्च न्यायालय

विवरण: यह मामला 'पति द्वारा पत्नी के त्याग' (Desertion) पर आधारित था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शास्त्रीय हिंदू कानून के तहत, पति के क्रूर व्यवहार या दूसरी शादी के बावजूद, पत्नी को विवाह संबंध तोड़ने (तलाक) का अधिकार नहीं है, जब तक कि वह उसकी जाति की अनिवार्य परंपरा न हो। कोर्ट ने कहा कि पत्नी केवल 'न्यायिक पृथक्करण' (Separate Residence and Maintenance) की मांग कर सकती है, तलाक की नहीं।

बहुविवाह का निषेध:  प्राचीन परंपराओं के अनुसार बहु विवाह निषेध नहीं था व्यक्ति अपनी वर्ण और समर्थ के अनुसार एक या एक से अधिक पत्नी (अर्थात विवाह कर सकता था) रख सकता था किंतु कोई भी स्त्री एक या एक से अधिक पति नहीं रख सकती थी इस पर शास्त्रीय निषेध था। इसका उदाहरण कुछ इस प्रकार से है मनुस्मृति के अनुसार श्लोक 81"वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा । एकादशे स्त्री जननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ।। श्लोक 82 "या रोगिणी स्यात्तुहिता सम्पन्ना चैव शीलता । साऽनुज्ञाप्याधिवेत्तव्या नावमान्या च कर्हिचित् ।। हिंदी अनुवाद: स्त्री यदि वन्ध्या हो अर्थात् प्रथम रजोदर्शन से 7 वर्ष तक यदि संतान न हो, आठवें वर्ष में मृतवत्सा (संतान न जीते हों), दसवें वर्ष में केवल कन्या ही हो और ग्यारहवें वर्ष में अपुत्रिणी हो तो शीघ्र ही दूसरा ब्याह कर लेना चाहिये 81-82

श्लोक 83 "अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रुषिता गृहात् । सा सद्यः संनिरोद्धव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ ।। श्लोक 84 "प्रतिषिद्धापि चेद्या तु मद्यमभ्युदयेष्वपि । प्रेक्षासमाज गच्छेद्वा सा दण्ड्या कृष्णलानि षट् ।। हिंदी अनुवाद: दूसरा ब्याह करने पर पहली स्त्री स्वामी से रुष्ट होकर यदि घर से भागे तो उसे पकड़कर घर में बन्द कर देना चाहिये या उसको उसके पिता के गृह पहुँचा देना चाहिये । जो स्त्री पति के निषेध करने पर भी उत्सवों में मद्यपान करे या खेल तमाशा देखने जाय तो ऐसी स्त्री को राजा छः कृष्णल दण्ड दे 83-84 तथा ऋग्वेद वेद में भी ऐसे संकेत मिलते हैं जहाँ एक पति की कई पत्नियों के होने का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद (10.145): इस सूक्त को 'सपत्नी बाधनम' कहा जाता है, जिसमें एक पत्नी अपनी सौतन (दूसरी पत्नी) पर प्रभाव पाने के लिए मंत्रों का उच्चारण करती है।, ऋग्वेद (1.62.11): "पतिं न पत्नीरुशतीरुशन्तं सप्र्शन्ति तवा शवसावन्मनीषाः ॥" हिंदी अनुवाद: "जैसे प्रेम करने वाली पत्नियां अपने प्रेमी पति का आलिंगन करती हैं, वैसे ही हमारी स्तुतियां आपको स्पर्श करती हैं।" यहाँ 'पत्नियां' (बहुवचन) शब्द का प्रयोग बहुविवाह की उपस्थिति को दर्शाता है। और (शतपथ ब्राह्मण श्लोक 9.4.1.6) "तस्मादेकस्य बह्व्यो जाया भवन्ति..." हिंदी अनुवाद: "इसी कारण से एक पुरुष की बहुत सी पत्नियाँ होती हैं, परंतु एक स्त्री के बहुत से पति नहीं होते।" और महाभारत और पुराण पुराणों में उदाहरण: भगवान कृष्ण की पत्नियों (रुक्मिणी, सत्यभामा आदि) और राजा दशरथ की तीन पत्नियों का वर्णन जगप्रसिद्ध है। लेकिन हिन्दू कोड बिल ने एक पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने पर रोक लगाने (Monogamy) का प्रस्ताव दिया, आजादी से पहले (1955 से पूर्व), शास्त्रीय हिंदू कानून के तहत एक हिंदू पुरुष को एक से अधिक पत्नी रखने (Polygamy) का कानूनी अधिकार प्राप्त था। उस समय बहुविवाह को अपराध नहीं माना जाता था, बल्कि इसे एक सामाजिक और धार्मिक मान्यता प्राप्त थी।

(Viraswamy Gramini v. Appaswami Gramini) (1863) 1 मद्रास हाई कोर्ट रिपोर्ट्स 375 यह बहुविवाह की वैधता पर सबसे प्रारंभिक और स्पष्ट निर्णयों में से एक है।

आदेश: न्यायालय ने स्पष्ट रूप से निर्धारित किया कि "एक हिंदू पुरुष को अपनी पहली पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी शादी करने से रोकने वाला कोई भी कानून अस्तित्व में नहीं है।" कोर्ट ने माना कि हिंदू शास्त्रों के अनुसार बहुविवाह प्रतिबंधित नहीं है, इसलिए एक पुरुष चाहे जितनी शादियाँ कर सकता है और वे सभी कानूनी रूप से वैध मानी जाएंगी।

(Arumugam v. Muthu) AIR 1921 Mad 426 इस मामले में प्रश्न यह था कि क्या दूसरी पत्नी और उससे पैदा हुए बच्चे वैध उत्तराधिकारी हैं।

आदेश: मद्रास उच्च न्यायालय ने प्रिवी काउंसिल के सिद्धांतों का पालन करते हुए कहा कि बहुविवाह के तहत की गई दूसरी, तीसरी या चौथी शादी 'अमान्य' (Void) नहीं है। उन सभी पत्नियों को भरण-पोषण का अधिकार है और उनके बच्चे अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा पाने के पात्र हैं।

लेकिन बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर द्वारा बनाया गया हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 जो उस समय के समाज में एक बड़ा बदलाव था। जो वर्तमान समय में आज हमारे सामने है (Hindu Marriage Act, 1955) इस अधिनियम की दो मुख्य धाराएं बहुविवाह पर रोक लगाती हैं:

धारा 5 (i): यह धारा विवाह की पहली और अनिवार्य शर्त बताती है कि विवाह के समय किसी भी पक्षकार (वर या वधू) का जीवित पति या पत्नी नहीं होना चाहिए।

धारा 11: यदि कोई व्यक्ति धारा 5 (i) का उल्लंघन करके दूसरी शादी करता है, तो इस धारा के तहत वह विवाह 'शून्य' (Void) माना जाता है। यानी कानून की नज़र में उस विवाह का कोई अस्तित्व नहीं होता।

धारा 17: यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत आने वाले व्यक्ति (हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख) यदि दूसरी शादी करते हैं, तो उन्हें दंडित किया जाएगा।

धारा 494 आई०पी०सी० की परिभाषा "जो कोई भी, पति या पत्नी के जीवित रहते हुए, किसी ऐसी परिस्थिति में विवाह करता है जिसमें ऐसा विवाह उस पति या पत्नी के जीवनकाल में होने के कारण शून्य (Void) माना जाता है, वह इस धारा के तहत अपराधी होगा।" और इस अपराध को करने वाले व्यक्ति (स्त्री या परुष) को 7 साल तक की सजा हो सकती है और जुर्माना भी हो सकते हैं जो न्यायालय समझे।

(Lily Thomas v. Union of India) (2000) 6 SCC 224 इस मामले में सरला मुद्गल मामले के फैसले की समीक्षा और उसे पुख्ता करने वाला मामला था। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि एक से अधिक पत्नी रखना हिंदू कानून के तहत अपराध है। कोर्ट ने कहा कि द्विविवाह का कानून किसी की धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि यह सामाजिक सुधार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए है तथा  कोर्ट ने स्पष्ट किया कि द्विविवाह (Bigamy) के लिए सजा केवल तभी मिलेगी जब यह साबित हो जाए कि दूसरी शादी के समय पहली शादी वैध रूप से अस्तित्व में थी। सजा वही 7 साल की जेल बरकरार रखी गई।

(Sarla Mudgal v. Union of India) AIR 1995 SC 1531 यह भारत में बहुविवाह (Polygamy) को लेकर सबसे महत्वपूर्ण मामला माना जाता है। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यदि कोई हिंदू पुरुष अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए बिना केवल दूसरी शादी करने के उद्देश्य से इस्लाम धर्म अपना लेता है, तो उसकी दूसरी शादी शून्य (Void) होगी। उसे भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 (पुराने IPC की धारा 494) के तहत 'द्विविवाह' (Bigamy) के लिए दंडित किया जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन से पहली शादी कानूनी रूप से समाप्त नहीं होती।

दत्तक ग्रहण और संरक्षण: गोद लेने की प्रक्रिया पहले थी लेकिन वह प्रक्रिया बहुत ही कठिन थी जैसे गोद लिया जाने वाला बच्चा उसी वर्ण (जाति) का होना चाहिए जिसका गोद लेने वाला पिता है। और अन्य प्रकार की कमियां थी इन बढ़ाओ को हटाते हुए गोद लेने की प्रक्रिया को सरल बनाया तथा गोद लिए गए संतान को संपत्ति में हिस्सेदार बनाया गया यह एक बड़ा परिवर्तन था हिंदू कोड बिल में जिसको बाबा साहब अंबेडकर ने किया। जो आज हमारे सामने हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के नाम से जाना जाता है।

(Ram Gopal v. P.K. Kaul) AIR 1976 SC 1234 इस मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम के तहत, गोद लेने के लिए केवल यह आवश्यक है कि दत्तक माता-पिता और बच्चा दोनों 'हिंदू' हों। कोर्ट ने कहा कि अधिनियम यह अनिवार्य नहीं करता कि बच्चा और गोद लेने वाले माता-पिता एक ही जाति या उपजाति के होने चाहिए। यदि कोई ब्राह्मण व्यक्ति किसी अन्य जाति के बच्चे को गोद लेता है, तो वह गोद लेना पूरी तरह वैध है।

(Valsamma Paul v. Cochin University) AIR 1996 SC 1011 इस मामले में यह जाति और आरक्षण से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण फैसला है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई उच्च जाति का व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के बच्चे को गोद लेता है, तो उस बच्चे की मूल जाति नहीं बदलती। कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई व्यक्ति केवल आरक्षण का लाभ लेने के उद्देश्य से किसी अन्य जाति में गोद नहीं जा सकता। यदि कोई उच्च जाति का व्यक्ति SC/ST परिवार में गोद जाता है, तो उसे उस जाति का आरक्षण लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि उसने वह पिछड़ापन या छुआछूत नहीं झेला है जो उस जाति के मूल सदस्यों ने झेला है।

Kasturi Devi v. Deputy Commissioner, Kurukshetra & Ors. CWP No. 13813 of 2017 निर्णय सन 2018) इस मामले में गोद लिए गए बच्चे के जाति प्रमाण पत्र के अधिकारों पर चर्चा हुई। न्यायालय ने कहा कि बच्चा गोद लेने के बाद दत्तक परिवार का हिस्सा बन जाता है, लेकिन सामाजिक लाभ (Social Benefits) और आरक्षण के मामले में उसकी जैविक उत्पत्ति (Biological Origin) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ताकि आरक्षण नीति का दुरुपयोग न हो।

हिन्दू कोड बिल सदन में पारित हो जाने के बाद का स्वरूप: जब यह बिल सदन में सारे विवादों को जीत लेने के बाद और सभी की एक राय हो जाने के बाद तथा सदन के बाहर इस बिल को लेकर जो अफवाहें जनता के बीच अफवाहें फैलाई गई थी कि इस बिल में भाई बहन की शादी का प्रावधान किया जा रही है इस प्रकार के माहौल का अंत हो जाने के बाद हिंदू कोड बिल को चार भागों में विभक्त कर दिया गया और उसे अधिनियम के रूप में अधिनियमित किया गया जो आज हमारे सामने इस प्रकार से है।

1.      हिंदू विवाह अधिनियम (1955): इसने बहुविवाह को अवैध घोषित किया और तलाक का अधिकार दिया।

2.      हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956): महिलाओं को संपत्ति में अधिकार प्रदान किए गए (यद्यपि पूर्ण समानता 2005 के संशोधन के बाद ही मिल सकी)।

3.      हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम (1956): बच्चों के संरक्षण संबंधी नियम।

4.      हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (1956): गोद लेने के अधिकारों को सुदृढ़ किया गया।

निष्कर्ष

 अंतत हिंदू कोड बिल पर डॉ. अंबेडकर का संघर्ष केवल एक कानून के लिए नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा के लिए था। आज हम भारतीय समाज में महिलाओं को जो कानूनी अधिकार (शिक्षा, संपत्ति, विवाह की स्वतंत्रता) देख रहे हैं, उसकी नींव डॉ. अंबेडकर ने ही रखी थी। बल्कि भारतीय समाज में सदियों से व्याप्त लैंगिक असमानता को मिटाने का एक शंखनाद था। डॉ. अंबेडकर का यह दृढ़ विश्वास कि 'किसी समाज की प्रगति का माप उस समाज की महिलाओं की प्रगति से किया जाना चाहिए', इस बिल की आत्मा थी। यद्यपि तत्कालीन विरोध के कारण इसे पूर्ण रूप से एक साथ स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन आज के कानूनचाहे वह संपत्ति में अधिकार हो या तलाक का प्रावधान अंबेडकर की दूरदर्शिता का ही परिणाम हैं। आज जब हम आधुनिक और प्रगतिशील भारत की बात करते हैं, तो डॉ. अंबेडकर द्वारा महिलाओं को दिए गए ये कानूनी अधिकार ही उस सशक्त राष्ट्र की वास्तविक नींव नजर आते हैं।

 डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने हिंदू कोड बिल के माध्यम से भारतीय महिलाओं को 'वस्तु' से 'व्यक्ति' का दर्जा दिलाने की नींव रखी। उनके द्वारा प्रस्तावित सुधारों ने ही आगे चलकर 1955-56 के हिंदू अधिनियमों का मार्ग प्रशस्त किया। महिलाओं को संपत्ति और स्वाभिमान का अधिकार देकर उन्होंने सामाजिक न्याय की जो मशाल जलाई थी, वह आज भी भारतीय लोकतंत्र को आलोकित कर रही है। उनका इस्तीफा देना उनके सिद्धांतों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण था, जिसने अंततः समाज की सोच को बदलने पर मजबूर किया।

जबकि इस बिल को पारित करने में लगभग 9 साल लग गए पर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर दृढ़ विश्वास था कि वह अपने सामने इस बिल को पास होते हुए देखेंगे उनके विश्वास को सदन के कुछ सदस्यों ने साथ दिया तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने भी बाबा साहब का इस बिल को पारित करने में बहुत मदद किया हां जी अभी एक सच्चाई है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू जी को अपनी सत्ता जाने का डर था पर इन सब के बाद भी हिंदू कोड बिल सदन में पारित हुआ और आज यह बिल भारत की समस्त महिलाओं के अधिकारों के लिए एक प्रहरी के रूप में कार्य कर रहा है।

 

 

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह

           एडवोकेट

हाईकोर्ट इलाहाबाद

मो०-9532112005

 

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