डॉ अंबेडकर का उत्तर प्रदेश जिला आगरा में 18 मार्च 1956 को दिए के भाषण का विश्लेषण
डॉ अंबेडकर का
उत्तर प्रदेश जिला आगरा में 18 मार्च 1956 को दिए के भाषण का
विश्लेषण
बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर द्वारा
उत्तर प्रदेश के जिला आगरा में भाषण दिनांक 18 मार्च, 1956 को दिया था इस भाषण का जिक्र "रोटी से अधिक महत्व
स्वाभिमान का है" के नाम से हेडिंग डॉ आंबेडकर वॉल्यूम
(हिंदी) खंड 40 पृष्ठ
संख्या 404 से 406 तक
18 मार्च, 1956 के दिन आगरा में
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण आयोजित किया गया था। सभा में अध्यक्ष पर थे उत्तर
प्रदेश शे. का. फे. के अध्यक्ष आयु. तिलकचंद कुरील। मंच पर आयु. श्रीकृष्णदत्त
पालीवाल और उत्तर प्रदेश के कई मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता और नेता उपस्थित थे। सभा
में करीब दो लाख का जनसमुदाय उपस्थित था। ठीक साढ़े छह बजे समारोह के आयोजन स्थल
रामलीला मैदान में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का आगमन हुआ।
रामलीला मैदान में
प्रवेश करते ही 'अम्बेडकर
की जय हो' के नारों
से आसमान गूंज उठा। केवल आगरा ही नहीं वरन् आसपास के गांव-शहरों से उनका भाषण
सुनने के लिए हजारों की संख्या में अस्पृश्य जनसमुदाय वहां इकट्ठा हुआ था। मोटर से
उतरने के बाद लाठी के सहारे लोगों का सहारा लेकर उन्हें मंच तक जाना पड़ा लेकिन
भाषण देते वक्त एक स्टूल के सहारे वे खड़े रहे। इस अवसर पर उन्हें पांच हजार
रुपयों की और एक हजार रुपयों की इस प्रकार से दो थैलियां दी गईं। उन्होंने में
कहा- 25 साल पहले
राजनीति में प्रवेश करते समय मेरे जीवन के तीन उद्देश्य थे। पहला, अस्पृश्यों के हर
घर में ज्ञान की गंगा का प्रवाह पहुंचाना। इस उद्देश्य में मुझे काफी हद तक सफलता
मिली है। कहा जा सकता है कि शिक्षा के क्षेत्र में आज अस्पृश्य लोग आगे भले न हों, मुझे आत्मविश्वास
है कि कुछ ही दिनों में वे अच्छी प्रगति हासिल कर सकते हैं। मेरे कार्य का दूसरा
महत्वपूर्ण उद्देश्य था सरकारी नौकरियों में अस्पृश्यों को व्यापक प्रतिनिधित्व
दिलाना। मेरी कोशिश से प्राप्त सफलता आज आपके सामने है। इन दोनों उद्देश्यों में
आज मुझे सफलता प्राप्त हुई है। लेकिन दूरदराज के गांवों में रहने वाले मेरे अनगिनत
दलित बंधुओं की स्थिति में सुधार लाने के मेरे तीसरे उद्देश्य में मुझे अभी बहुत
कम सफलता मिली है। इसीलिए,
मेरी
बची हुई जिंदगी और मेरा पूरा सामर्थ्य मैंने इन अस्पृश्य भाइयों के सर्वांगीण
सुधार के लिए व्यतीत करने का निश्चय किया है। जब तक वे खेती छोड़ कर शहरों में
रहने नहीं आते तब तक उनके जीवन की स्थितियों में सुधार नहीं आने वाला। हमारे
गांवों में रहने वाले इन अस्पृश्यों का अपने पुरखों के गांवों में रहने का मोह अभी
खत्म नहीं हुआ है। उन्हें लगता है, यहीं अपनी रोजी-रोटी है। लेकिन, रोटी से अधिक महत्व
सम्मान का होता है। जिन गांवों में उनके साथ कुत्तों जैसा व्यवहार किया जाता है, पग-पग पर उन्हें
अपमानित किया जाता है जहां उन्हें अपमानित होकर स्वाभिमान शून्य जीवन जीना पड़ता
है ऐसे गांव किस काम के! गांवों के अस्पृश्य अपने गांवों से निकल कर वहां चले जाएं
जहां परती जमीन हो। उस पर कब्जा कर अपनी मालिकियत कायम करें। जमीन पर कब्जा करते
समय अगर किसी ने टोका तो उनसे साफ-साफ कहें कि हम जमीन छोड़ेंगे नहीं। हम सरकार को
सही लगान देने के लिए तैयार हैं। नए गांव बसा कर स्वाभिमान से परिपूर्ण इंसानियत
भरा जीवन जिएं। नए समाज का निर्माण करें। वहां के सभी काम करें। ऐसे गांवों में
कोई उन्हें अस्पृश्य कह कर उनके साथ बुरा व्यवहार नहीं कर सकेगा। मेरा स्वास्थ्य
ठीक होते ही मैं अस्पृश्यों द्वारा परती जमीन पर कब्जा करने की मुहीम चलाने वाला
हूं।
अपने गरीब और
अज्ञानी बंधुओं की सेवा करना पढ़े-लिखों का पहला कर्तव्य होता है। बड़े ओहदों पर
जाने के बाद अक्सर पढ़े-लिखे अशिक्षित बंधुओं को भूल जाते हैं। अपने समाज के बारे
में अपनत्व का भाव न होने के कारण ऐसा होता है। उनके मन में अपने बंधुओं के प्रति
तिलमिलाहट नहीं होती यही इसकी वजह है। धर्मभावना का अभाव भी एक और कारण है। वे अगर
अपने अनगिनत बांधवों की ओर ध्यान नहीं देंगे तो समाज का ह्रास होगा।
अन्य किसी भी धर्म
से बौद्ध धर्म श्रेष्ठ है। मेरी इच्छा है कि आप सभी मेरे साथ इस वर्ष बौद्ध धर्म
को स्वीकार करें। इस बारे में मैं आप पर जबरदस्ती नहीं करूंगा। यह आपकी मर्जी का
सवाल है। लेकिन मेरे बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद मैं अस्पृश्य नहीं रहूंगा। आप
सब जब बौद्ध बनेंगे तब आपके पास आरक्षित जगहों का अधिकार नहीं रहेगा। साथ ही हमें
यह भी ध्यान में रखना होगा कि विधानसभा और लोकसभा में आरक्षित जगहों की मियाद
संविधान के अनुसार केवल दस सालों की है। जल्द ही यह मियाद पूरी हो जाएगी। जिंदगीभर
आरक्षित जगहें थोड़े ही रहने वाली हैं? आखिर हमें अपने सामर्थ्य के सहारे आगे बढ़ना है। आखिर
हमें अपने ही पैरों पर खड़े रहना होगा। आरक्षित जगहों के सहारे हम प्रगति हासिल
नहीं कर सकते।
बौद्ध बनने के बाद, मैं आपका नेतृत्व
नहीं कर पाऊंगा और मैं फेडरेशन में भी नहीं रह पाऊंगा। इसीलिए मेरी इच्छा है कि
दलित वर्गीयों में से ही किसी ऐसे व्यक्ति को आगे आकर मेरी जगह और नेतृत्व की कमान
सम्हालें। वरना एक खंभे के सहारे टिके तंबू की तरह अपना संगठन बिखर जाएगा।
बौद्ध बनने के बाद, लेकिन मैं राजनीति
से अलग नहीं होऊंगा। केवल शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन के टिकट पर उम्मीदवार बन कर
मैं चुनाव नहीं लडूंगा। मैं अपने बलबूते चुनाव लडूंगा। भले फिर मेरी विजय हो या
मुझे हार का सामना करना पड़े। मुझे उसकी फिकर नहीं। मैं आप लोगों को हक और अधिकार
दिलवाने जीवन के अंतिम सांस तक लडूंगा।
अर्थ मंत्री के पास
तो नोन-तेल बेचने तक की अकल नहीं है। जो मिट्टी से जुड़ा काम तक करने की योग्यता
नहीं रखते वे आज एम. पी. और एम. एल. ए, बन कर महीने की 400 रुपयों की तनख्वाह और 21 रुपयों का भत्ता ले रहे हैं।"
बाबासाहेब
डॉ भीमराव अंबेडकर का उपरोक्त भाषण का विश्लेषण कुछ इस प्रकार से करने की मैं
कोशिश कर रहा हूं
बाबा साहब ने अपने इस भाषण में जिस
परती जमीन का जिक्र किया है पहले यह जानना सबसे ज्यादा जरूरी होगा की परती की जमीन
किसे कहते हैं - 1956 में 'परती जमीन' का अर्थ उस समय 'परती जमीन' से तात्पर्य ऐसी
भूमि से था जो खेती योग्य तो थी, लेकिन किसी व्यक्ति के निजी स्वामित्व में नहीं थी। यह मुख्य
रूप से दो प्रकार की थी:
सरकारी बंजर भूमि:
वह भूमि जो राजस्व विभाग के पास थी।
दलित समाज गांव कि
मजदूरी से बाहर निकाल कर अपनी जमीन पर अपना काम करें- बाबा साहब डॉ अम्बेडकर का
मानना था कि दलित समाज के पास अपनी खुद की कोई जमीन नहीं हुआ करती जबकि यह बात सही
भी है क्योंकि ज्यादातर दलित समाज जो गांव के निवासी है उनका मुख्य काम जमींदारों
के खेतों में मजदूरी करना क्योंकि सवर्ण समाज के लोगो के पास अत्यधिक जमीन अर्थात
वे जमीदार हुआ करते थे और वे लोग अपनी जमीन पर स्वयं खेती नहीं करते थे बल्कि अपनी
जमीन पर मजदूर लगाकर खेती करवाया करते थे ज्यादातर मजदूर दलित समाज के लोग हुआ
करते थे उनके पास अपनी कोई जमीन नहीं हुआ करती थी इसलिए वह दूसरों के खेतों में
मजदूरी करते थे (यह प्रथा आज भी प्रचलित है) क्योंकि दलित समाज आर्थिक रूप से
कमजोर सदैव रहा है इसके कई कारण है दलित समाज के पास आपनी कोई जमीन नहीं होती, ना अपना कोई मकान
होता है और ना ही शिक्षा हुआ करती थी इसी कारण से वह उसी गांव में रहना ज्यादा
पसंद करते थे जहां उनके पूर्वज पीढ़ियो से रह रहे थे लेकिन दलित समाज तो अपने आप
को उसे गांव को अपना पैतृक गांव समझता था लेकिन इसके विपरीत जो उस गांव के जमीदार
लोग या गैर दलित समुदाय के लोग दलित समुदाय के लोगो को मुफ्त का मजदूर समझा करते
थे और गांव के जमींदार या गैर दलित समाज के लोग अपने घरों का सारा काम करवाया करते
थे कुछ जगहों पर तो यह भी देखा गया है कि मुफ्त में मजदूरी भी करवा ली जाती थी
क्योंकि अब तो बहुत कम वस्तु विनिमय की प्रथम भारत में है किंतु लगभग 70 से 80 वर्ष पूर्व वस्तु
विनिमय की प्रथम भारत में बड़े पैमाने पर प्रचलित थी इस प्रचलन का सीधा असर दलित
समाज के लोगों पर हुआ करता था इस प्रथा के चलते काम के बदले अनाज दिए जाते थे काम
ज्यादा होते थे अनाज कम दिए जाते थे (मजदूरी के बदले अनाज उतने ही दिए जाते थे
जितने से दलित परिवार मारे ना अगले दिन काम करने फिर से उनके घर पहुंचे) इतना ही
नहीं पूरा परिवार दलितों का मिलकर मजदूरी करता था मजदूरी इसलिए ज्यादा नहीं दी
जाती थी की कम मजदूरी देने पर पूरा परिवार मजदूरी करेगा और कभी भी अपनी उन्नति के
लिए कुछ नहीं सोचेगा सिवाय पेट की भूख के इसलिए दलितों की आर्थिक स्थिति सदैव बहुत
खराब रहती थी और तो और यदि दलितों के घर की महिलाएं काम करने जमीदार या गैर दलितों
के यहां न जाए तो बदतमीजी और मारपीट जैसी स्थितियां उत्पन्न हो जाया करती थी
कभी-कभी तो दलित महिलाओं के साथ गैर दलित या जमींदार लोग अमानवी दुर्व्यवहार किया
करते थे प्रदेश का पुलिस विभाग यह अन्य
प्रशासनिक अधिकारी तो दलितो की अभी कुछ नहीं सुनते तो अंदाज़ लगा लो कि दलितों की
आवाज पहले कहां सुना करती रही होगी
इसीलिए बाबा साहब ने कहा अपने इस
भाषण में की दलित समुदाय के लोग गांव से बाहर निकलकर परती जमीन पर कब्जा कर अपनी 'मलिकियत' (Ownership) स्थापित कर लें, तो उनकी यह दूसरों
के खेतों में मजदूरी करने से बेहतर होगा कि वह स्वयं आत्मनिर्भर बन जाएं 1950 के दशक में भारत
में भूमि सुधारों (Land
Reforms) का दौर राज्य सरकारों द्वारा चलाया गया उत्तर प्रदेश ही नहीं
अन्य प्रदेशों में जमींदारी उन्मूलन जैसे अधिनियम के आने से जिम्मेदारी प्रथा को
बहुत कम कर दिया लेकिन दलित समाज की स्थिति इस तरह बनी रही कुछ राज्यों के अधिनियम
इस प्रकार से हैं- बिहार भूमि सुधार अधिनियम (Bihar Land Reforms Act, 1950), मध्य प्रदेश मध्य
प्रदेश भू-राजस्व संहिता (M.P.
Land Revenue Code, 1959), राजस्थान राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर
पुनर्ग्रहण अधिनियम (Rajasthan
Land Reforms and Resumption of Jagirs Act, 1952), पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल भूमि सुधार अधिनियम (West Bengal Land Reforms Act, 1955), महाराष्ट्र
महाराष्ट्र भूमि राजस्व संहिता (Maharashtra Land Revenue Code, 1966), पंजाब/हरियाणा
पंजाब ग्राम साझा भूमि (विनियमन) अधिनियम (Punjab Village Common Lands Regulation Act, 1961), कर्नाटक
कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम (Karnataka Land Reforms Act, 1961) उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं
भूमि सुधार अधिनियम,
1950" (Uttar Pradesh Zamindari Abolition and Land Reforms Act, 1950) चूंकि भाषण
आगरा (UP) में था, इसलिए यह कानून
सबसे महत्वपूर्ण था। इस कानून ने जमींदारी प्रथा को खत्म किया, लेकिन भूमि का
वितरण समान नहीं रहा। धारा 194 और 198 के तहत, ग्राम सभा के पास
परती या खाली जमीन के आवंटन का अधिकार था।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के
हक में भूमि संरक्षण के नाम पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के कुछ आदेश
जो इस प्रकार से है
माननीय
सर्वोच्च न्यायालय का आदेश P. Rami Reddy and Ors. v. State of Andhra Pradesh and Ors., (1988) 3 SCC
433 मामला आदिवासियों की भूमि संरक्षण से संबंधित एक ऐतिहासिक निर्णय है, जिसमें सर्वोच्च
न्यायालय ने आंध्र प्रदेश अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण (संशोधन) विनियमन, 1970 को संवैधानिक रूप
से वैध ठहराया। न्यायालय ने गैर-आदिवासियों के बीच भी आदिवासी भूमि के हस्तांतरण
पर रोक को सही माना, ताकि
आदिवासियों का शोषण रोका जा सके। यह नियम
आदिवासी क्षेत्रों (Scheduled
Areas) में गैर-आदिवासियों को भूमि हस्तांतरण को प्रतिबंधित करता है।
निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह प्रावधान आदिवासियों को उनकी भूमि से
बेदखल होने से बचाने के लिए एक 'उचित प्रतिबंध' है, न कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन। कोर्ट ने कहा कि जब संपत्ति
पर गैर-आदिवासियों का कब्जा हो, तो यह साबित करने का भार उन्हीं पर होगा कि हस्तांतरण वैध था, क्योंकि आदिवासी
अपनी भूमि के अधिकार साबित करने में असमर्थ हो सकते हैं।
माननीय सर्वोच्च
न्यायालय का आदेश Lingappa
Pochanna Appelwar v. State of Maharashtra, (1985) 1 SCC 479।, भारत के माननीय
सर्वोच्च न्यायालय का एक ऐतिहासिक निर्णय है। इस मामले में न्यायालय ने महाराष्ट्र
रेस्टोरेशन ऑफ लैंड्स टू शेड्यूल्ड ट्राइब्स एक्ट, 1974 (Maharashtra Restoration of Lands to Scheduled
Tribes Act, 1974) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। मुख्य उद्देश्य: इस
अधिनियम का उद्देश्य उन आदिवासी (Scheduled Tribes) व्यक्तियों की कृषि भूमि को बहाल करना था, जिन्हें गलत तरीके
से गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित कर दिया गया था। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि यह
कानून "वितरणात्मक न्याय" के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अर्थ समाज के
कमजोर वर्गों, विशेषकर
आदिवासियों को शोषण से बचाना और संपत्ति का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना है।
स्वाभिमान बनाम
रोटी: बाबा साहब डॉ अम्बेडकर का इशारा इसी ओर था कि दलित संगठित
होकर इन जमीनों पर अपना दावा पेश करें, क्योंकि कानूनी रूप से सरकार इसे भूमिहीनों को देने के
लिए प्रतिबद्ध थी इतना ही नहीं बाबा साहब ने अपने भाषण में कहा था की रोजी-रोटी से
अधिक महत्वपूर्ण अपना सम्मान होता है क्योंकि आज भी उन गांव में ऐसी स्थिति है
जहां पर जाति व्यवस्था व छुआछूत का बहुत ही बोलबाला है कहने को तो अब आजाद है पर भारत
में दलित समाज को कहा आज़ादी मिली है जबकि आज भी गैर दलित समाज के लोग बड़े आराम से
कह देते हैं अब भारत में जाति व्यवस्था छुआछूत जैसी विषमताएं या अवधारणा नहीं है
यह बात सिर्फ वह कह सकते हैं पर असली अमल में बिल्कुल नहीं ला सकते और ना यह
सच्चाई है। आत्म सम्मान कि एक सच्ची घटना- उत्तर प्रदेश काडर के 2022 बैच के आईएएस
अधिकारी रिंकू सिंह राही ने मंगलवार को सेवा से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने आरोप
लगाया कि लंबे समय से उन्हें कोई अर्थपूर्ण पोस्टिंग नहीं दी गई। उन्हें केवल ‘अटैच्ड’ पद पर रखा गया, जहां वेतन तो मिलता
रहा, लेकिन
जनसेवा का कोई अवसर नहीं दिया गया। रिंकू सिंह राही एक दलित आईएएस अधिकारी हैं।
उन्होंने इस्तीफे का फैसला ऐसे समय में लिया जब पिछले कई महीनों से उन्हें कोई
जिम्मेदारीपूर्ण पद नहीं सौंपा गया था। जुलाई 2025 में शाहजहांपुर में वकीलों के विरोध प्रदर्शन के दौरान
उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने कुछ लोगों से उठक बैठक कराई थी। इसके
बाद उन्हें उत्तर प्रदेश राजस्व बोर्ड से अटैच कर दिया गया। जबकि 28 जुलाई 2025 को रिंकू सिंह
राही को शाहजहांपुर के पुवायां का सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) नियुक्त किया
गया। मात्र 36 घंटे बाद
ही उन्हें इस पद से हटा दिया गया। 36 घंटा अर्थात डेढ़ दिन के अंदर सरकार ने उन्हें एसडीएम
पद से हटा दिया यह जल्दी सिर्फ दलित होने की वजह से दिखाई गई नहीं तो ऐसे बहुत
सारे लोग जो सवर्ण समुदाय से आते हैं वह चाहे जो भी गलती करें या कोई भी कम करें
उसका विरोध किसी भी व्यक्ति द्वारा किया जाए पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह
व्यक्ति दलित समुदाय से नहीं आता है वह जैसा चाहे सिस्टम में रहकर सिस्टम के साथ
खेल सकता है और किसी भी प्रकार का कोई कार्य कर सकता है उदाहरण के तौर पर प्रेमलता
त्रिपाठी प्राइमरी विद्यालय सहजनवां गोरखपुर में समन्वय के पद पर 6 अक्टूबर 2012 से कार्यरत हैं.
जिनकी प्रथम नियुक्ति 11 फरवरी 2009 है. जोकि बस्ती
जिले में विकासखंड कुदरा में प्राथमिक विद्यालय अहिल्या में थी. इनके नाम की महिला
जुलाई 2011 से ज्वाइनिंग
में है. उन्हें शक है कि विभाग के अंदर से ही ये फर्जीवाड़ा बड़े पैमाने पर हो
रहा है. 2012 और 11 की बात है लेकिन
जांच प्रक्रिया 2020 मैं शुरू
हुई यह इसलिए देर से शुरू हुई क्योंकि मामला दलित से संबंधित नहीं था
इसके बाद से वे निरंतर ‘अटैच्ड’ स्थिति में रहे और कोई मीनिंगफुल काम नहीं सौंपा गया। रिंकू
सिंह राही इससे पहले प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) अधिकारी के रूप में मुजफ्फरनगर
के वेलफेयर विभाग में तैनात थे। वर्ष 2009 में उन्होंने विभाग में एक बड़े घोटाले को उजागर किया
था। घोटाले का भंडाफोड़ करने के बाद हमलावरों ने उन पर गोलीबारी कर दी थी। वे सात
गोलियों के घाव सहकर भी बच गए थे। इसके बावजूद उन्होंने सरकारी सेवा में बने रहकर
जनसेवा करने का फैसला किया और बाद में यूपीएससी परीक्षा पास कर आईएएस बन गए।
उन्होंने एक्स पर लिखा, “रिंकू सिंह
राही, एक दलित, का इस्तीफा कोई
व्यक्तिगत फैसला नहीं है,
बल्कि
पूरे प्रशासनिक सिस्टम पर गंभीर सवाल है। उन्होंने 2009 में भ्रष्टाचार उजागर किया, मौत के मुंह से
लौटे (सात गोलियां लगीं),
फिर
भी सिस्टम के अंदर जनसेवा के लिए प्रतिबद्ध रहे। आज उन्हें काम नहीं देने की बात
कही जा रही है और इस उपेक्षा ने उन्हें इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया।”
बौद्ध धर्म और
आरक्षण- बाबा साहेब डॉ अंबेडकर ने अपनी इसी भाषण में यह भी कहा है कि
मैं बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद अस्पृश्य नहीं रहूंगा तथा उन्होंने यह भी कहा
कि मेरे पास आरक्षित अर्थात आरक्षण का अधिकार नहीं रहेगा लेकिन सम्मान से बढ़कर
आरक्षण नहीं हो सकता उन्होंने इसीलिए इस बात को कहा है और सम्मान के लिए ही
उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया था "रोटी से अधिक महत्व सम्मान का होता
है।" यह वाक्य इस बात पर जोर देता है कि अपमानित होकर मिलने वाले भोजन से
कहीं श्रेष्ठ वह भूखा रहना है जिसमें व्यक्ति का सिर ऊंचा हो।
शिक्षित वर्ग के
प्रति नाराजगी और कर्तव्यबोध: इस भाषण में डॉ. अंबेडकर का एक दर्द छलकता
है जिसे अक्सर 'शिक्षितों
ने मुझे धोखा दिया' के रूप में
याद किया जाता है। उन्होंने कहा: "पढ़े-लिखों का पहला कर्तव्य अपने गरीब और
अज्ञानी बंधुओं की सेवा करना है।" उन्होंने आलोचना की कि समाज के जो लोग
पढ़-लिखकर बड़े ओहदों पर पहुँच गए, वे अपने पीछे छूटे समाज को भूल गए। उनके मन में अपने भाइयों
के प्रति वह 'तिलमिलाहट' नहीं रही जो समाज
सुधार के लिए आवश्यक है। यह आज के समय में भी 'Pay back to society' (समाज को वापस देना) के सिद्धांत की
प्रासंगिकता को दर्शाता है।
नेतृत्व का
हस्तांतरण और संगठन की भविष्यदृष्टि: बाबासाहेब को अपने गिरते स्वास्थ्य
का आभास था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बौद्ध बनने के बाद वे 'शेड्यूल्ड कास्ट
फेडरेशन' का नेतृत्व
नहीं कर पाएंगे। एक खंभे का तंबू: उन्होंने संगठन की तुलना एक खंभे पर टिके तंबू
से की। यदि वह खंभा (स्वयं अंबेडकर) हट गया, तो तंबू गिर जाएगा। इसलिए उन्होंने नए नेतृत्व को आगे
आने का आह्वान किया ताकि आंदोलन व्यक्ति-केंद्रित न रहकर विचार-केंद्रित बने।
निर्भीक राजनीति: बाबा साहब
डॉक्टर अंबेडकर का मानना था कि वह बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद राजनीति नहीं
छोड़ेंगे लेकिन वह किसी भी नेता के पिछलगू बनकर नहीं रहना चाहते थे वह अपने बलबूते
अपने सिद्धांतों के अनुसार राजनीति में रहना चाहते थे इतना ही नहीं डॉक्टर अंबेडकर
को जो लोग आज मानते हैं कि उन्होंने संविधान में आरक्षण की नींव रखी उन्होंने अपने
इस भाषण जो की उत्तर प्रदेश के जिला आगरा में दिया था उन्होंने इस भाषण में खुद ही
कहा है कि मैंने जो शेड्यूल कास्ट फेडरेशन बनाया है मैं उससे अब चुनाव नहीं लडूंगा
बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद अर्थात खाने का अर्थ यह रहा कि बौद्ध धर्म स्वीकार
करने के बाद आरक्षण का कोई लाभ नहीं मिलेगा जब आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा तब वह
शेड्यूल कास्ट फेडरेशन से चुनाव नहीं लड़ सकते कुछ लोग इस बात को मानने को बिल्कुल
भी तैयार नहीं होगे की जिन्होंने संपूर्ण भारत की अनुसूचित जाति और अनुसूचित
जनजाति के लोगों के लिए रिजर्वेशन की व्यवस्था किया वह तुम अपने लिए रिजर्वेशन
नहीं चाहते थे इसे कहते हैं निस्वार्थ भाव से सेवा उन नेताओं की तरह नहीं जो अपने
लिए अपने भाई-बहन बेटा बेटी पत्नी के लिए जिए सही समाजसेवी वही व्यक्ति होता है जो
अपनों के लिए ना नहीं बल्कि अपने समाज के लिए जिए
निष्कर्ष: भाषण का
चिरकालिक महत्व
डॉ. भीमराव रामजी
अंबेडकर का आगरा (18 मार्च 1956) का भाषण केवल एक
सामाजिक या राजनीतिक संबोधन नहीं था, बल्कि वह दलित समाज के आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और
वैचारिक क्रांति का घोषणापत्र था। “रोटी से अधिक महत्व स्वाभिमान का है” यह वाक्य उनके
चिंतन का मूल तत्व है, जो यह
बताता है कि मनुष्य का जीवन केवल भौतिक आवश्यकताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मान और
गरिमा उसके अस्तित्व का आधार है।
इस भाषण में उन्होंने
दलित समाज को गांवों की गुलामी और अपमानजनक परिस्थितियों से बाहर निकलकर स्वतंत्र
जीवन जीने की प्रेरणा दी। परती भूमि पर अधिकार स्थापित करने का विचार केवल आर्थिक
सुधार नहीं, बल्कि
सामाजिक स्वतंत्रता का माध्यम था। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा और
सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं, लेकिन वास्तविक
परिवर्तन तब तक अधूरा रहेगा जब तक गांवों में रहने वाले दलितों का जीवन स्तर नहीं
सुधरता।
अंबेडकर ने शिक्षित
वर्ग को उनके सामाजिक दायित्वों की याद दिलाई और चेताया कि यदि वे अपने समाज से कट
जाएंगे तो समाज का पतन निश्चित है। उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाने की बात करके
सम्मान और समानता पर आधारित जीवन का मार्ग प्रस्तुत किया, भले ही इसके लिए
आरक्षण जैसी सुविधाओं का त्याग क्यों न करना पड़े। उनका यह दृष्टिकोण दर्शाता है
कि वे अधिकारों से अधिक आत्मसम्मान को महत्व देते थे।
अंततः, यह भाषण एक व्यापक
संदेश देता है कि सामाजिक परिवर्तन केवल कानूनों या नीतियों से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, संगठन, शिक्षा और
आत्मनिर्भरता के सम्मिलित प्रयास से संभव है। अंबेडकर का यह आह्वान आज भी उतना ही
प्रासंगिक है, क्योंकि यह
व्यक्ति और समाज दोनों को अपने अधिकारों के लिए सजग, स्वाभिमानी और सक्रिय बनने की प्रेरणा देता
है।
एडवोकेट हाईकोर्ट इलाहाबाद
मो०नं०-9532112005

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