दलित का वैभव क्यों चुभता है? : मायावती की सैंडल से सवर्ण मानसिकता तक

2011 में टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडिया टाइम्स की एक चर्चित रिपोर्ट में तत्कालीन उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बहन कुमारी मायावती की जीवनशैली और सुरक्षा व्यवस्था का उल्लेख करते हुए लिखा गया था — “When she needed new sandals, her private jet flew empty to Mumbai.” अर्थात जब उन्हें नई सैंडल चाहिए होती थीं, तो उनका निजी विमान खाली मुंबई भेजा जाता था। रिपोर्ट में उनकी सुरक्षा व्यवस्था को भी “किसी राष्ट्राध्यक्ष जैसी” बताया गया।
प्रश्न यह नहीं है कि किसी मुख्यमंत्री की सुरक्षा या जीवनशैली कैसी थी। असली प्रश्न यह है कि ऐसी खबरों को जिस अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया, उसके पीछे छिपी मानसिकता क्या थी? दरअसल भारत में दलितों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त होने से सवर्ण तथा गैर दलित समाज के लोगों को बर्दाश्त नहीं होता इस पर एक अच्छी कहावत याद आती है तो कड़वा ऊपर से नीम पर चढ़ा अर्थात दलित होना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी समस्या उसे पर से दलित महिला सत्ता के सर्वोच्च पद पर पहुंचकर सम्मान और वैभव के साथ जीवन जीती है, तो वही चीज़ अचानक मीडिया की “सनसनी” बन जाती है। और पूरे देश में अफवाहों का बाजार गर्म कर दिया और पूरे देश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बदनाम करने के लिए हर कदम मीडिया ने उठाई जो मीडिया उसे समय उठा सकती थी।

यह केवल पत्रकारिता नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का प्रतिबिंब है जो सदियों से दलितों को गरीब, झोपड़ी में रहने वाला और दबा-कुचला देखने की आदी रही है। उन्हें इस बात से समस्या नहीं होती कि देश में बेरोजगारी, भूख या भ्रष्टाचार बढ़ रहा है; उन्हें सबसे अधिक तकलीफ तब होती है जब कोई दलित आत्मसम्मान, सुरक्षा और शक्ति के साथ खड़ा दिखाई देता है।
दरअसल, बहन मायावती पर की गई ऐसी टिप्पणियाँ केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं थीं, बल्कि उस दलित स्वाभिमान पर कटाक्ष थीं जिसने सदियों की सामाजिक गुलामी को चुनौती देकर सत्ता के केंद्र तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

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